जब उसे हक़ीक़त पता चली
कॉलेज के वो दिन भी क्या ख़ूबसूरत होते हैं, जहाँ किताबों के पन्नों से ज़्यादा नज़रें हसीन चेहरों के मुताले (अध्ययन) में मसरूफ़ रहती हैं। फिज़ाओं में एक अजीब सी खनक होती है, हर तरफ़ नई उम्र की रंगीनियां, कहकहे और बेफ़िक्री मुस्कुराहटें बिख़री होती हैं। इन्हीं हसीन चेहरों के दरमियान डूब जाना और उन लम्हों को ज़िंदगी समझ लेना ही उस उम्र का सबसे हसीन धोखा होता है। शाहिद की जिंदगी का कुल सरमाया भी यही था।
शाहिद को सोनिया से इश्क़ हो गया था। ऐसा इश्क़ जिसमें दीवानगी भी थी और एक अजीब सा सुकून भी। सोनिया की बड़ी-बड़ी आंखों और उसकी मख़मली बातों के जादू में शाहिद ख़ुद को पूरी तरह भुला चुका था। वे अक्सर साथ वक्त गुज़ारते। खंडवा की तंग गलियों से निकलकर असीरगढ़ के प्राचीन और ऊंचे किले की फ़सीलों (दीवारों) तक उनकी यादें किसी ख़ुशबू की तरह बिख़री हुई थीं। वहां की ख़ामोश फिज़ाओं में, इतिहास के साए में, वे एक-दूसरे की तस्वीरें खींचते, घंटों बैठकर मुस्तक़बिल (भविष्य) के हसीन सपने बुनते। शाहिद को लगता था कि सोनिया सिर्फ़ उसके लिए बनी है। लेकिन शाहिद ने इस बात का ज़िक्र कभी अपने दोस्तों से भी नहीं किया। उसके नज़दीक यह पाकीज़ा एहसास किसी महफ़िल में बयान करने के लिए नहीं, बल्कि रूह में महसूस करने के लिए था।
इश्क़ हर गुज़रते दिन के साथ परवान चढ़ रहा था। शाहिद सोनिया के प्यार में पागल था दीवाना था, मगर उसे क्या मालूम था कि हक़ीक़त के पर्दे के पीछे कोई और ही कहानी चल रही है।
एक रोज़ शाहिद अपने सबसे करीबी दोस्त के कमरे पर अचानक जा पहुंचा। वहां उसका दोस्त बहुत खुश था। बातों-बातों में उसने शाहिद को बताया, “यार! मैं आज बहुत ख़ुश हूं, मैं एक लड़की के प्यार में गिरफ़्तार हो चुका हूं। ताज्जुब की बात यह है कि वह भी मुझसे उतनी ही मोहब्बत करती है, उसने ख़ुद मुझे प्रपोज किया है।” शाहिद ने मुस्कुराहट के साथ मुबारकबाद देते हुए पूछा, “आख़िर वह ख़ुशनसीब लड़की है कौन?”
दोस्त ने मेज की दराज़ से कुछ ख़त और तस्वीरें निकालीं और शाहिद के सामने फैला दीं। उन तस्वीरों को देखते ही शाहिद के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई, उसके दिल की धड़कन जैसे थम सी गई। वह सोनिया थी! वही सोनिया जिसके साथ उसने असीरगढ़ की सीढ़ियों पर वफ़ा की क़समें खाई थीं। उन ख़तों में वही अल्फ़ाज़ थे, वही वादे थे जो सोनिया ने शाहिद से किए थे। शाहिद को समझ नहीं आ रहा था कि सच क्या है और झूठ क्या। क्या वह तमाम लम्हे जो उसने सोनिया के साथ बिताए, महज़ एक ‘फ्लर्ट’ थे? धोखा थे , मज़ाक थे,शाहिद अंदर से टूट गया, मगर वह ख़ामोश रहा। उसे लगा कि वो अब दो कदम भी नहीं चल पाएगा,उसे लगा कि वो बीमार हो गया है,उसने न अपने दोस्त से कुछ कहा, न ही सोनिया से कोई सवाल किया।
वक्त गुज़रता गया और धीरे-धीरे शाहिद के दोस्त को भी शाहिद और सोनिया के पुराने रिश्ते का इल्म (ज्ञान) हो गया। जब उसे हक़ीक़त पता चली, तो उसने भी सोनिया से दूरी बना ली। उसे समझ आ गया कि सोनिया की फ़ितरत में वफ़ा नहीं, बल्कि जज़्बातों से खेलना है। जल्द ही यह खबर पूरे कॉलेज में आग की तरह फैल गई कि सोनिया एक ‘फ्रॉड’ लड़की है जो एक साथ कई लोगों को अपने हुस्न के जाल में फंसाती है। सोनिया, जो कभी कॉलेज की जान थी, अब तन्हा रह गई थी। मोहब्बत के तमाम रास्ते अब उसके लिए बंद हो चुके थे और वह अपने किए पर बुरी तरह पछता रही थी।
शाहिद ने ख़ुद को संभाला और जिंदगी में आगे बढ़ने का फ़ैसला किया। कुछ समय बाद शाहिद ने ‘नीला’ नाम की लड़की से शादी का ऐलान कर दिया। शादी का दिन आया, महफ़िल सजी हुई थी, रोशनी और संगीत का शोर था। सोनिया भी उस शादी में पहुंची। वह एक कोने में खड़ी देख रही थी कि जिसे उसने ठुकराया और जिसके जज़्बातों से खेला, वह आज अपनी नई जिंदगी में कितना मुतमइन (संतुष्ट) और खुश है। सोनिया की आंखें अपने किए पर शर्मिंदा थीं, वह नजरें मिलाने के काबिल नहीं रही थी।वो वो बहुत कमज़ोर सी नज़र आ रही थी,सबसे बड़ी बात उसके इर्द गिर्द रहने वालीं में से कोई भी उसके पास नहीं था।
वही पास में शाहिद का वह पुराना दोस्त भी मौजूद था। वह भी अब सोनिया से पूरी तरह बेगाना हो चुका था। उसने भी तर्क ताल्लुक़ कर लिया था,वह अपनी किसी और दोस्त लड़की के साथ खिलखिलाकर बातें कर रहा था, मुस्कुरा रहा था, जैसे सोनिया का उसकी ज़िंदगी में कभी कोई वजूद ही न रहा हो। सोनिया को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ दो लड़कों को नहीं खोया, बल्कि अपनी इज़्ज़त और अपना वक़ार (सम्मान) भी गंवा दिया है। वह अपनी ही नज़रों में गिर गई थी, जबकि शाहिद और उसका दोस्त अपनी-अपनी खुशियों में मगन थे। सोनिया वहीं खड़ी अपनी बर्बादी का मंज़र देखती रही, और उसकी आंखों से बहते आंसू उसके पछतावे की गवाही दे रहे थे। वो बहकते हुए कदमों से शादी के फंक्शन से बाहर निकल रही थी उस कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसका अगला कदम उसे कहां ले जाएगा,वो सोच रही थी मुझे तो पश्चाताप का मौक़ा भी नहीं मिला।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
