उनका पाँच साल
कुछ लोग भाईचारा बोने में माहिर होते हैं,
और उसी भाई को चारे में बदल देते हैं।
एक दिन उन्होंने मेरे एक भाई को बुलाया,
चाय-पानी के बहाने उसे अपने पास बिठाया,
इधर-उधर की बातों में उसे उलझाया,
फिर धीरे से कानों में ज़हर सा कुछ फुसफुसाया—
और उसकी आँखों में अचानक चमक आ गई।
अब वह मुझसे कुछ खिंचा-खिंचा रहने लगा है,
अपनों के बीच भी अजनबी-सा कहने लगा है।
विरोधी का काम यहीं बन गया,
आपसी दरार देख उसका सीना तन गया।
अब इधर की बात उधर पहुँचने लगी है,
वह हर मोड़ पर नई चालें बुनने लगी है।
उसे समझ आ गया—फूट का बीज पड़ चुका है,
अब मनमाने ढंग से लूट का रास्ता खुल चुका है।
वो यूँ ही नेता नहीं बना है,
चालों के इस खेल में ही तो उसका कद तना है।
अब वह निश्चिंत होकर चुनाव जीतेगा,
जनता रोती रहे—
उसका पाँच साल फिर चैन से बीतेगा।
— राजेन्द्र लाहिरी
