ग़ज़ल
तेरे खातिर जमाने से ही तौबा कर लिया मैंने।
कठिन राहों पे चल कर दिल में तेरे घर लिया मैंने।।
ख़ुदा गर चाह लेगा तो ज़माना क्या करेगा फिर।
रज़ा हो या न हो हिस्सा तो बढ़-चढ़ कर लिया मैंने।।
ख़ता मुझसे अगर हो जाये मुझको माफ़ कर देना।
सजा अपनी तेरे खातिर मेरे ही सिर लिया मैंने।।
करो वादा न होगे तुम जुदा मुझसे कभी भी अब।
यही पैगाम मेरा तुमको लिख कर धर लिया मैंने।।
मेरे दिल ने जो चाहा तो कभी भेजूँगी ख़त तुझको।
मुहब्बत करके यूं महसूस आँखें भर लिया मैंने।।
— प्रीती श्रीवास्तव
