पुराना पचास का नोट
विमल सुबह नौ बजे ही पहुँच गया था मेरे घर। हम दोनों को अपने पुराने मित्र से मिलने शहर से दूर एक कालोनी में जाना था। “ चलो भाई बहुत दूर है, फिर लौटना भी है।सरकार दादा जल्दी छोड़ने वाले भी नहीं हम दोनों को “ विमल ने इतना कहकर गाड़ी की चाबी को उठाकर बाहर निकल गया। मैं भी बाहर निकला।
विमल ने आपनी मोटर सायकिल को चालू किया और हम दोंनो एकता नगर, कालोनी के लिए निकल पड़े।
हम दोनों एक किलोमीटर ही पहुँचे थे कि रास्ते में बहुत ही अधिक ट्रैफिक के कारण रास्ता जाम था।लोगों का ऑफिस जाने का समय था भीड़ तो होनी ही थी।हम पन्द्रह की जगह पच्चीस मिनट में पहुँचे मित्र के घर पहुँचे लेकिन सरकार दादा नहीं मिले। एक दिन पहले मोबाइल से बात होने के बाद भी वे नहीं मिले।पड़ोसी ने बताया कि बहुत ही जरूरी काम से वे निकले हैं।मोबाइल से बात बाद में कर लूँगा यह कहकर वे गए हैं।हम दोनों वापस लौट गए।
हम दोनों लगभग डेढ़ किलोमीटर पहुँचे कि गाड़ी अचानक रुक गई।विमल और मैंने गाड़ी के किक को मारते रहे गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई।फरवरी खत्म होने वाली थी,हल्की ठण्ड वाले दिन थे फिर भी पसीना निकलने लगा।हम एक घर के पास बने चबूतरे में थक कर बैठ गए।घर से एक महिला निकली “ गाड़ी चालू नहीं हो रही है, इसलिए बैठ गए हैं।यहाँ आसपास कोई मिस्त्री है क्या ? मैने पूछा ।
“ सामने गली में है “ उस महिला ने कहा ।
“ पानी मिलेगा पीने को ?
“ हाँ अभी लाती हूँ “ वह महिला अंदर चली गई।
कुछ पल बाद वह निकली तो उसके हाथ में पानी से भरा एक जग औऱ गिलास था।उसने हमें दे दिया।काले सफेद बाल वाली वह आकर्षक महिला थी। उसके इस उम्र में भी गठा हुआ शरीर था जो बहुत कम देखने मिलता है। मैंने और विमल दोनों ने पानी पिया और गिलास उस महिला को दे दिया।विमल गाड़ी लेकर सामने मिस्त्री को देने चला गया।मैं वहीं चबूतरे में बैठ गया।वह महिला जग गिलास लेकर अंदर चली गयी।थोड़ी देर में बाहर निकली मुझसे बोली “ उनका चेहरा पहचाना सा लगता है, बहुत ही जाना- पहचाना । बीस साल से ऊपर हो गए।क्या नाम है इनका ?
“ विमल “
“ हाँ !! विमल, मैं इतने साल बाद भी नहीं भूल पाई हूँ इस चेहरे को।“
कुछ समय बाद विमल आ गया।“ गाड़ी दे आया हूँ। फिर उस महिला की तरफ देख कर बोला “ यह सड़क चौड़ी हुई है क्या , मुझे लगता इस तरफ पहले आया हूँ यहाँ तब यह सड़क सकरी थी। कुछ घरों में सामने आँगन जैसा था। ?
“ मुझे पहचाना विमल ? “ उस महिला ने विमल के उत्तर देने से पहले ही सवाल किया ।
“ चेहरा तो कुछ पहचाना सा लग रहा है। “
“ बिंदिया “ वह बोली
“ ओह !! विमल ने अपने सर पर हाथ मारा।
“ आओ अंदर बैठो “
उसके आग्रह को हम टाल नहीं सके।हम अंदर गए। अंदर एक हाल था वहाँ सोफा लगा हुआ था, हम बैठ गए।
“ मैं चाय बनाकर लाती हूँ “ इतना कहकर वह भीतर चली गयी। वहीं एक अखबार रखा था उसे मैं पढ़ने लगा। हाल के एक कोने में एक तखत बिछा था, दीवार से सटा हुआ।तखत में कोई व्यक्ति सोया था उसका मुँह दीवार की तरफ था।दस मिनट में वह चाय बनाकर ले आयी।
“ लीजिए “ कहकर उसने चाय एक छोटे से टेबल पर रख दिया।
“ पुराना अखबार है यह “ वह बोली ।
“ वह कौन है “ सोए हुए व्यक्ति पर इशारा करते हुए विमल ने कहा।
“ मेरे पति हैं।वे सुन नहीं सकते।शरीर से भी लाचार हैं बेचारे “
“ और बच्चे ? “ चाय का घूँट पीते हुए विमल ने पूछा ।
“ दो लड़के हैं ,दोनों बाहर नौकरी करते हैं “ वह बोली।“ अब हम दोनों ही रहते हैं यहाँ।फल का धंधा बंद कर दिया है बच्चों के कहने पर “ उसने चाय खत्म किया और उठकर अंदर चली गयी।
दो मिनट बाद उसने अंदर से आवाज लगाई “ विमल सुनना जरा “
विमल उठकर अंदर चला गया।दरवाजा बंद हो गया था अंदर जाने के बाद।मैं पुराने अखबार को उलट-पलट रहा था।बैठे-बैठे मुझे पंद्रह मिनट हो गए थे।मैं उठा औऱ दरवाजे की ओर बढ़ा। पास जाकर देखा दरवाजा तो बंद था अंदर से, कोई आवाज भी बाहर नहीं आ पा रही थी। दरवाजे में एक लॉक लगा था जिसमें हैंडल लगा था चाबी नहीं थी।हो सकता हो अंदर लगी चाबी वाली जगह से झाँक कर देखा तो बस देखता ही रह गया।विमल औऱ वह महिला दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए पड़े थे, पलंग पर। वस्र विहीन दो देह एक होने को आतुर थे। वे गुथम-गुत्था हो रहे थे।मुझे लगा बरसात की बूंदों से प्यासी धरती तृप्त होती है, उसी तरह वह महिला तृप्त हुए जा रही थी।बरसों बाद किसी की कोई चाह पूरी हुई हो ऐसा लग रहा था। जल्द ही मैं दरवाजे से हट गया आकर फिर पुराने अखबार को उलटने-पलटने लगा।मैंने सोचा कि इतना प्रगाढ़ संबंध जिसे विमल पहले ही स्थापित कर चुका था उसमें अभी भी मधुरता बनी हुई है। यह अद्भुत था मेरे लिए देखना।
मुझे खाली बैठे हुए बहुत समय हो चुका था। अंदर और क्या चल रहा है यह उत्सुकता मेरे मन मे थी।मैं एक बार फिर उठा और झाँका तो देखा वह महिला विमल की गोद में सिर रखे लेटी थी और उसके हाथों में एक डायरी थी जिसे वह विमल को खोलकर दिखा रही थी।मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया।मैं जल्दी से वापस आया और बैठ गया, क्योंकि दोनों कपड़े पहन चुके थे।मुझे बैठे दो मिनट ही हुए थे बैठे हुए कि विमल दरवाजा खोलकर बाहर निकला “ चलो अब चलते हैं, गाड़ी भी बन गई होगी। “ विमल ने कहा ।
मैं खड़ा हो गया।उतने में वह महिला भी बाहर निकली उसके बाल यथावत नहीं थे।उसे न विमल को यह आभास हुआ कि मेरी आँखों मे अंदर का दृश्य अभी भी कैद है।हम बाहर निकल गये।विमल ने कहा “ चलता हूँ फिर अगर इधर आना हुआ तो अवश्य आऊँगा ।“
हम गली की ओर मुड़ गए जहाँ गाड़ी रिपेरिंग के लिए दिए थे।गाड़ी बनकर तैयार थी।विमल ने मिस्त्री को पैसा दिया, गाड़ी चालू की और हम आगे बढ़ गए।थोड़ी दूर जाकर एक होटल में विमल ने गाड़ी रोकी।
“ आओ कुछ चाय नाश्ता करते हैं “ हम लोग होटल के अंदर पहुँचे।एक कोने वाली टेबल के पास बैठे।होटल के नौकर ने पानी लाकर रखा।
“ दो प्लेट समोसे लेते आना “ विमल ने होटल के सप्लाई करने वाले से कहा।फिर मेरी तरफ देखा और कहा “ तुम कुछ पूछोगे नहीं “
“ तुम ही बताओ “ मैंने उत्सुकता से कहा।
पानी का गिलास उठाकर पीने के बाद विमल ने कहा “ बीस साल से भी ऊपर हो गए, मैं सब्जी और कुछ फल लेने एक दिन बाजार गया था। जवाहर बाज़ार में एक थोक फल वाले से मैंने पूछा आधा पेटी सेव दोगे।उसने इन्कार कर दिया।बिदियाँ वहीं खड़ी फल खरीद रही थी। उसने कहा मैं दे देती हूँ, और उसने मुझे कुछ ही रुपये ऊपर लेकर आधा पेटी दे दिया।मैं फल के साथ सब्जी खरीद कर चला आया।दो दिन बाद मैं फिर बाजार गया। जवाहर बाजार के भीतर से निकला वह फल वाले के पास मुझे फिर दिखी।इस बार मैंने उससे एक दर्जन केले ले लिए।उसने मुझसे दो दर्जन कम दाम में ले लेने कहा और मैंने खरीद लिया।इस बार उसका आकर्षक चेहरा बहुत ही भा गया मुझे। जाते-जाते मैंने कई बार उसे पलटकर देखा।
चार-पाँच दिन बाद मैं सब्जी लेने फिर बाजार गया।इस बार जवाहर बाजार जानबूझकर गया। मेरी आँखे उसे ढूंढ रही थी।वह नहीं दिखी। सब्जी लेकर वापस जब मैं लौटा तो वह फल खरीद चुकी थी।मुझे देखी और पूछी “ क्या लेना है ?
मैंने कहा “ कुछ भी दे दो “ थोड़ा रुका फिर बोला “ अनार दे दो “ फल को झोले में रखने के बाद मैंने पूछा “ आपकी फल की दुकान है ? “
“ हाँ “
“ कहाँ ?
“ एकता नगर के पास, लेकिन कल से मैं पहाड़ी चौक के पास अपने घर में ही लगाऊँगी “ वह बोली।
“ आईये चाय पीते हैं “ मैंने कहा।
दुकान वाले को अपनी पेटियाँ देखना कहकर वह मेरे साथ चाय पीने के लिए चल पड़ी।एक दुकान में हम दोनों ने चाय पी।मैंने यूँ ही उसका घर का पता- ठिकाना पूछ लिया।उसने बता दिया ।
इसी तरह हप्ते में उससे दो बार मुलाकात हो जाती।मुझे वह बहुत ही अच्छी लगने लगी।एक दिन मैंने उसे फ़िल्म देखने टॉकीज बुला लिया वह चली आयी।इसी तरह मिलने का सिलसिला चलता रहा।मैं उसे सायकल में और कभी रिक्शे में घुमाता रहा।
एक दिन सुबह-सुबह जब वह फल लेकर घर लौट रही थी मैं रिक्शे के पीछे-पीछे जाकर उसका घर देख आया। दूर से उसे घर के सामने उतरते देखा और लौट आया। मिलने जुलने का सिलसिला जारी था।
एक रात गयारह बजे मैं सायकल लेकर घूमने निकल पड़ा।घूमते-घूमते अचानक मैंने पहाड़ी चौक की तरफ चला गया।चौक के आसपास बिलकुल सुनसान था।कोई भी नजर नहीं आ रहा था।मैंने बिलकुल उसके घर के सामने सायकल रोक दिया।उसके घर के आँगन में दो खटिया बिछी थी।अप्रैल का महीना था।पहले खटिए में वह सोए दिखी। दूसरे एक पुरूष सोया दिखा।मैंने सायकल खड़ी की, आसपास सुनसान था।मैंने छोटे-छोटे पत्थर के तीन चार टुकड़े उठाए और बिदियाँ के शरीर पर फेंका।तीसरे पत्थर पड़ने पर वह उठी।
मुझे सामने खड़ा देख हड़बड़ा गई।बिलकुल पास आकर बोली “ इतनी रात में कैसे “
“ बस ऐसे ही “
“ बाजू गली से पीछे की तरफ आओ “
मैं डरते-डरते आखिर पीछे चला गया।सायकल उसके घर के सामने खड़ी थी।उसने पीछे का दरवाजा खोला और मुझे अंदर खींच लिया। अंदर बिजली बंद थी।हम दोनों ने एक दूसरे को बाँहो में जकड़ लिया।एक दूसरे को चूमने लगे। अनायास हम दोनों जमीन में ही एक दूसरे को समर्पित कर दिए।
किसी स्त्री के शरीर को भोगने के सुख पहली बार मेरे लिए अद्भुत था।बहुत देर तक हम एक दूसरे से लिपटे पड़े रहे।हम दोनों एकाएक उठे। कपड़े पहने।उसने कहा “ मैं तुमसे प्रेम करने लगी हूँ, लेकिन मेरी कुछ मजबूरियां हैं।“ उसने सामने रखी आलमारी से एक डायरी निकाली ।
कहा “ जो भी नोट हो दस बीस निकालो “ मैंने जेब पचास का नोट निकाल कर दिया। उसने उस नोट में बिदियाँ लिखने कहा।मैंने नोट के खाली जगह में लिख दिया।उसने मेरा नाम विमल लिखा।डायरी में उस दिन की तारीख लिखी और बंद कर रख दिया।बाहर जाकर उसने देखा सड़क पर कोई नहीं है।मुझसे कहा धीरे से सायकल लेकर निकल जाओ।बहुत ही डरते-डरते मैं घर वापस आया।उस रात मैं सो नहीं सका। बिदियाँ मेरे जेहन में बस गई थी।दूसरे दिन मैं आठ बजे उठा।नहा कर तैयार हुआ।नाश्ता कर रहा था तो एक टेलीग्राम आया।दूसरे दिन मुझे इंदौर ज्वाइन करना था।मैं इंटरव्यू दे चुका था।मेरी पहली नौकरी थी।मैं बिना रिजर्वेशन के ही इन्दौर निकल पड़ा।फिर कंपनियां बदली। ट्रांसफर होते रहे।आज तुम्हारे साथ यहाँ आया हूँ।बीस साल से भी ऊपर हो गए ,उसके बाद आज उससे मिल रहा हूँ।मैं तो भूल चुका था।उसने उस रात में मेरा दिए पचास के नोट में उसका और मेरा नाम लिखा डायरी में रखा था, उसे दिखाया।उसने बताया कि कल ही अलमारी साफ करते हुए उसे अलग से निकाल कर रखी थी।इतना कहकर विमल शांत हो गया। मैंने उसके चेहरे पर एक अजीब ही संतुष्टि के भाव देखे ।उस रात उसने निश्चय ही डर में उसके शरीर का स्पर्श पाया होगा और आज पूरे इत्मीनान के साथ उसके शरीर के भूगोल को देखा और परखा।
विमल ने होटल वाले का बिल चुकाया और गाड़ी स्टार्ट कर हम दोनों घर की तरफ बढ़ चले।अपने जेब से बिछड़े पचास के नोट से भी विमल आज वर्षों बाद मिला था ।
— सुधीर कुमार सोनी
