अधूरी कहानी
पास रहते न जाने कब ये दूरी हो गई,
ना जाने क्यूँ ये कहानी फिर अधूरी हो गई।
समय के फेरों में न जाने यूँ ही उलझते गए,
क्या कहें, जाल में हम खुद ही फँसते गए।
छल के दलदल से मुझ पर कीचड़ उछाले गए,
जो दाग थे दिल के, वो अब तक न धुल पाए।
धूप पड़ी तो धूल भी सुनहरी हो गई,
भरने थे जो घाव, वही फिर से हरी हो गई।
पास रहते न जाने कब ये दूरी हो गई,
ना जाने क्यूँ ये कहानी फिर अधूरी हो गई।
दिल मोम सा उसका , कैसे पत्थर बन गया,
प्यार का अमृत भी जैसे जहर बन गया।
हाथ थाम कर जो कहती थी साथ जन्मों का,
ना जाने कब वही रिश्ता मीठा जहर बन गया।
बसा शहर जो प्यार का, वो बिखर सी गई ,
हम आधे रह गए, वो खुद में पूरी हो गई ।
पास रहते न जाने कब ये दूरी हो गई,
ना जाने क्यूँ ये कहानी फिर अधूरी हो गई।
मिले थे दिल से दिल, तो पनाह बन गए,
कागज़ और कलम भी जैसे गवाह बन गए।
जिसने खेल समझा प्यार को, खेलता ही गया,
वो गुनाह करके भी अब बेगुनाह बन गया।
सबके सामने वो क्यूँ कैसे बरी हो गई ,
मेरी ख्वाहिशे अधूरी, उसकी पूरी हो गई ।
पास रहते न जाने कब ये दूरी हो गई,
ना जाने क्यूँ ये कहानी फिर अधूरी हो गई।
— सोमेश देवांगन
