पर्यावरण

सस्ती और उपयोगी है पवन ऊर्जा

अक्षय ऊर्जा या नवीकरणीय ऊर्जा को प्रायः हमारी भविष्य की बिजली जरूरतों के समाधान के रूप में देखा जाता है। हम सदियों से प्रकृति की प्राकृतिक शक्ति का उपयोग कर रहे हैं। ऊर्जा के इन स्रोतों में से एक पवन ऊर्जा को प्रमुख स्रोत के रूप में माना जा सकता है। पवन चक्कियों और पानी के पहियों का उपयोग अन्न भंडारों को बिजली देने के लिए किया जाता था। अक्षय ऊर्जा के रूप में पवन ऊर्जा का उपयोग बड़े पैमाने पर आज भी किया जा रहा है। इसकी संभावनाओं को देखते हुए भारत सहित विश्व के अनेक देशों में महत्वपूर्ण नीतियाँ अपनायी जा रही हैं। इस संदर्भ में ही विश्व पवन दिवस प्रत्येक वर्ष 15 जून को मनाया जाता है। यह दिवस पवन ऊर्जा की महत्ता, उसकी वैज्ञानिक उपयोगिता तथा वैश्विक ऊर्जा संकट के समाधान में उसकी भूमिका को रेखांकित करने के उद्देश्य से मनाया जाता है।

वर्तमान समय में ऊर्जा की बढ़ती माँग, जीवाश्म ईंधनों की सीमितता और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याएँ मानवता के सामने गंभीर चुनौती हैं। ऐसे में पवन ऊर्जा एक स्वच्छ, अक्षय एवं सतत ऊर्जा स्रोत के रूप में उभरकर सामने आई है। इसी जागरूकता को बढ़ाने के लिए विश्व पवन दिवस मनाया जाता है।

विश्व पवन दिवस की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई, जब यूरोप की संस्था यूरोपियन विंड इनर्जी एसोसिएशन (EWEA) ने इसे आरम्भ किया। ग्लोबल विंड इनर्जी कौंसिल (GWEC) के सहयोग से 2009 में इसे वैश्विक रूप दिया गया और इसका नाम “ग्लोबल विंड डे ”अर्थात ‘वैश्विक पवन दिवस ‘रखा गया।

यह दिवस 2007 में यूरोप के 18 देशों में प्रारम्भ हुआ। तत्पश्चात 2009 में इसका वैश्विक विस्तार 35 देशों में आयोजन के रूप में हुआ।

वर्तमान में 50 से अधिक देशों में व्यापक स्तर पर आयोजन प्रतिवर्ष किया जा रहा है।

इस दिवस का उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, अपितु पवन ऊर्जा के वैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक पक्षों को जन-जन तक पहुँचाना है।

पवन ऊर्जा का वैज्ञानिक आधार

पवन ऊर्जा सूर्य की ऊष्मा से उत्पन्न वायुमंडलीय दाब-अंतर के कारण उत्पन्न होती है।जब पृथ्वी की सतह असमान रूप से गर्म होती है, तो वायु का संचलन होता है।इस गतिज ऊर्जा को पवन टरबाइन द्वारा विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है।

संक्षेप में इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है –

वायु → टरबाइन घूर्णन → यांत्रिक ऊर्जा → जनरेटर → विद्युत ऊर्जा

पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उपलब्धियाँ

(क) वैश्विक स्तर पर :

पवन ऊर्जा विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अक्षय ऊर्जा है।यह विश्व की कुल बिजली का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रदान कर रही है।

ऑनशोर (भूमि आधारित) और ऑफशोर (समुद्री) दोनों प्रकार के पवन ऊर्जा संयंत्र विकसित हो रहे हैं।

(ख) भारत के स्तर पर –

भारत विश्व में पवन ऊर्जा उत्पादन में शीर्ष देशों में शामिल है।2026 तक भारत ने लगभग 60 गीगावाट क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (एनआईडब्ल्यूई) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार सात राज्यों – तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में प्रमुख पवन ऊर्जा केंद्र हैं।भूमि सतह से 100 मीटर ऊपर(एजीएल) इन सात राज्यों की पवन ऊर्जा क्षमता 293 गीगावाट है और 120 मीटर एजीएल पर क्षमता 652 गीगावाट है। जो भारत सरकार द्वारा लक्षित 60 गीगावाट से कहीं अधिक है। ऐसे में सरकार त्वरित मूल्यह्रास लाभ के माध्यम से निवेश को प्रोत्साहित करके पवन ऊर्जा परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है। इस अपार संभावना का लाभ उठाने हेतु भारत सरकार ने वर्ष 2015 में राष्ट्रीय अपतटीय पवन ऊर्जा नीति को अधिसूचित किया, जिसका प्राथमिक उद्देश्य देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) में अपतटीय पवन ऊर्जा अवसंरचना में निवेश को प्रोत्साहित करना है।

(ग) तकनीकी विकास –

आधुनिक टरबाइन अधिक ऊँचे, शक्तिशाली और कुशल हो गए हैं। स्मार्ट ग्रिड और बैटरी तकनीक से ऊर्जा भंडारण में सुधार हुआ है।

पवन ऊर्जा का महत्व

(1) पर्यावरण संरक्षण-

पवन ऊर्जा CO₂ उत्सर्जन को कम करती है तथा जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में सहायक है।

(2) ऊर्जा सुरक्षा-

आयातित ईंधनों पर निर्भरता घटती है एवं

स्थानीय ऊर्जा स्रोत उपलब्ध कराती है।

(3) आर्थिक विकास-

इससे हरित रोजगार सृजन में बढ़ोत्तरी हुई है तथा ग्रामीण क्षेत्रों का पर्याप्त विकास हुआ है

(4) सतत विकास-

यह अनंत ऊर्जा स्रोत है, जिसको पर्याप्त उपयोग के पश्चात भी भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

पवन ऊर्जा की प्रासंगिकता

आज के युग में विश्व पवन दिवस की प्रासंगिकता अत्यंत बढ़ गई है, क्योंकि वैश्विक तापवृद्धि, ऊर्जा संकट, कार्बन न्यूट्रल अर्थव्यवस्था का लक्ष्य आदि गंभीर संकट विश्व के समक्ष हैं। पवन ऊर्जा इन सभी समस्याओं का एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है। आज यह केवल विकल्प नहीं, अपितु अनिवार्यता बन चुकी है।

चुनौतियाँ

(1) अनियमितता –

हवा हमेशा समान नहीं बहती, जिसके कारण ऊर्जा उत्पादन स्थिर नहीं रहता।

(2) उच्च प्रारंभिक लागत-

टरबाइन स्थापना महँगी है। इसके लिए भूमि एवं समुद्री परियोजनाओं में अधिक निवेश करना पड़ता है।

(3) पर्यावरणीय प्रभाव –

पवन ऊर्जा उत्पादन केन्द्रों का पक्षियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है, इससे उनके आवास तथा प्रजनन का खतरा बढ़ जाता है। ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षियों को गतिविधियों में बाधा पड़ती है।

(4) तकनीकी बाधाएँ _

ऊर्जा भंडारण तथा ग्रिड एकीकरण जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं।

(5) सामाजिक चुनौतियाँ-

उत्पादन केन्द्रों की अवस्थापना हेतु भूमि अधिग्रहण में स्थानीय विरोध की भी चुनौती सामने आती है।

विश्व पवन ऊर्जा दिवस कैसे मनाएँ

विश्व पवन दिवस को अनेक रचनात्मक और शिक्षाप्रद तरीकों से मनाया जाता है, संक्षेप में निम्नांकित उपाय हो सकते हैं –

(क) शैक्षिक गतिविधियाँ –

स्कूलों में पवन ऊर्जा पर प्रोजेक्ट

विज्ञान प्रदर्शनी

(ख) जन-जागरूकता

रैलियाँ, सेमिनार

सोशल मीडिया अभियान

(ग) तकनीकी प्रदर्शन

पवन ऊर्जा संयंत्रों का भ्रमण

मॉडल टरबाइन प्रदर्शन

(घ) रचनात्मक गतिविधियाँ

पतंग उड़ाना

चित्रकला प्रतियोगिता

(ङ) पर्यावरणीय संकल्प

स्वच्छ ऊर्जा अपनाने का संकल्प

ऊर्जा बचत अभियान

विश्व पवन ऊर्जा दिवस को सफल बनाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, जलवायु परिवर्तन समाधान तथा पवन ऊर्जा द्वारा भविष्य निर्माण जैसे उपयोगी संदर्भों में उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु विविध प्रयास किए जा सकते हैं।

अस्तु, विश्व पवन दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, अपितु मानवता के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अभियान है। यह हमें यह समझने का अवसर देता है कि प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करके हम पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों को साथ लेकर चल सकते हैं।

पवन ऊर्जा न केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि है, अपितु यह एक सतत, सुरक्षित और स्वच्छ भविष्य की आशा भी है। यदि मानव समाज को जलवायु संकट से बचना है, तो पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों को अपनाना अनिवार्य है।इसको हमें इस महत्वपूर्ण संदेश के रूप में समझना होगा – “जहाँ हवा है, वहाँ ऊर्जा है; और जहाँ ऊर्जा है, वहाँ भविष्य है।”

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर लखनऊ 226022 दूरभाष 09956087585

Leave a Reply