गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार
गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार,
धृतराष्ट्रों के सामने, गई व्यवस्था हार॥
सत्ता के गलियार में, गूंजे केवल शोर,
सत्य यहाँ दब-सा गया, झूठ मचाए जोर।
न्याय की हर राह पर, बैठा भ्रष्टाचार—
गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार॥
आवाज़ें उठती जहाँ, दबती हर बार,
सच पर सौरभ सदा, होते रहे प्रहार।
भीतर ही भीतर सड़े, टूटे हर आधार—
गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार॥
कानूनों के हाथ भी, बंधे हुए लाचार,
पैसों के आगे झुके, बिकता हर व्यवहार।
ईमानों की हार में, जीता अत्याचार—
गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार॥
जागो अब इंसान तुम, तोड़ो यह अंधकार,
सत्य-दीप जब-जब जले, होगा नया उद्गार।
तभी बचेगी अस्मिता, मिटे सारा अंधकार—
गूंगे थे, अंधे बने, सुनती नहीं पुकार॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
