दोहे
किसी पार्टी के कभी,बनना नहीं गुलाम,
इन्हे आपके वोट से,है बस केवल काम ||
यहाँ कीमती क्यों भला,बस नेता की जान |
दुश्मन तेरी जान का,कौन यहाँ पहचान ||
भूमि जिसने बेच दी,हुआ वही कंगाल |
सदा रहो मजदूर तुम,ये है उनकी चाल ||
ये विकास के नाम पर,छीन रहे अधिकार |
धूल झोंक कर आँख में,दें मृत्यु उपहार ||
ढ़ोगीं,झूठे मतलबी,करें मौत व्यापार |
बेच देश कर, कर रहे,कर्जे से श्रृंगार ||
कीड़े हैं इनके लिए,चलते फिरते लोग |
मिले भीड़ के वोट का, बस इनको सहयोग ||
— शालिनी शर्मा
