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शब्द से एल्गोरिद्म तक : हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्षों की तकनीकी यात्रा

हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा केवल समाचारों के प्रसार की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज, विचार और तकनीकी साधनों के निरंतर परिवर्तन की एक गहन गाथा भी है। जब उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में हिंदी में पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ, तब उस समय छपाई की विधि अत्यंत कठिन, श्रमसाध्य और समय लेने वाली थी। लकड़ी या धातु के अक्षरों को एक-एक करके सजाकर कागज पर छापा जाता था। समाचारों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में कई दिन लग जाते थे। फिर भी उस सीमित व्यवस्था के भीतर ही एक ऐसी चेतना का जन्म हो रहा था, जिसने भाषा को जनमानस से जोड़ने का कार्य किया। उस समय तकनीकी साधनों का अभाव था, परंतु संकल्प और विचारों की शक्ति इतनी प्रबल थी कि पत्रकारिता धीरे-धीरे समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचने लगी। यही वह आधार था, जिस पर आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता की विशाल संरचना विकसित हुई।

समय के साथ जब यांत्रिक साधनों का विकास हुआ, तब छपाई की गति और क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हाथ से चलने वाले उपकरणों के स्थान पर मशीनों का उपयोग होने लगा, जिससे कम समय में अधिक प्रतियाँ तैयार की जा सकीं। इससे समाचारों का प्रसार अधिक व्यापक हुआ और समाज के विभिन्न वर्गों तक सूचना पहुँचने लगी। इसी काल में दूरसंचार के साधनों के विकास ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब समाचारों का संप्रेषण पहले की तुलना में अधिक तीव्र गति से होने लगा। इससे समाचार पत्रों की ताजगी और प्रासंगिकता बनी रहने लगी। हिंदी पत्रकारिता ने इस परिवर्तन को आत्मसात करते हुए अपने दायरे का विस्तार किया और स्वतंत्रता चेतना के प्रसार में एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरी। तकनीकी साधनों और वैचारिक प्रतिबद्धता का यह समन्वय हिंदी पत्रकारिता की पहचान बन गया।

बीसवीं सदी के मध्य तक आते-आते अक्षर विन्यास की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पहले जहाँ प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग संयोजित करना पड़ता था, वहीं नई मशीनों के माध्यम से पूरी पंक्तियों को एक साथ तैयार किया जाने लगा। इससे समय की बचत हुई और समाचार पत्रों की संख्या में वृद्धि संभव हुई। हिंदी जैसी जटिल लिपि के लिए यह प्रक्रिया सहज नहीं थी, किंतु निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप इसे सफलतापूर्वक अपनाया गया। इसके कारण हिंदी पत्रकारिता का विस्तार केवल बड़े नगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक भी पहुँचने लगा। इस प्रकार पत्रकारिता का स्वरूप अधिक जनोन्मुखी होता गया और समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज इसमें सम्मिलित होने लगी।

इसके पश्चात छपाई की एक नई विधि का विकास हुआ, जिसने समाचार पत्रों को केवल सूचना का माध्यम ही नहीं, बल्कि एक आकर्षक दृश्य रूप भी प्रदान किया। अब चित्रों, आलेखों और सजावटी विन्यास के माध्यम से समाचारों को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाने लगा। इससे पाठकों की रुचि बढ़ी और समाचार पत्रों का प्रसार भी व्यापक हुआ। इस परिवर्तन ने पत्रकारिता को एक व्यवसायिक स्वरूप भी प्रदान किया, जहाँ समाचारों के साथ-साथ विज्ञापनों का महत्व भी बढ़ने लगा। हिंदी पत्रकारिता ने इस अवसर का उपयोग करते हुए अपने आर्थिक आधार को सुदृढ़ किया और अपने विस्तार की नई संभावनाएँ तलाशीं।

बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में जब संगणकीय साधनों का प्रवेश हुआ, तब पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मौलिक परिवर्तन देखने को मिला। अब लेखन, संपादन और विन्यास की पूरी प्रक्रिया यांत्रिक उपकरणों से हटकर संगणक पर होने लगी। इससे कार्य की गति बढ़ी, त्रुटियों में कमी आई और समस्त प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित हो गई। हिंदी भाषा के लिए उपयुक्त लिपि रूपों और साधनों के विकास ने इसे इस नई व्यवस्था में स्थान दिलाया। इसके परिणामस्वरूप हिंदी पत्रकारिता अधिक संगठित, व्यवस्थित और व्यावसायिक बनती चली गई। यह वह चरण था, जिसने पत्रकारिता को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकालकर आधुनिक युग में प्रवेश कराया।

इसके पश्चात जब वैश्विक जाल का विस्तार हुआ, तब पत्रकारिता की परिभाषा ही बदल गई। अब समाचार केवल मुद्रित पृष्ठों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे तत्काल पूरे विश्व में उपलब्ध होने लगे। हिंदी पत्रकारिता के लिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर था, क्योंकि इससे उसकी पहुँच देश की सीमाओं से बाहर भी बढ़ी। अब कोई भी व्यक्ति किसी भी समय समाचारों को पढ़ या देख सकता था। इस परिवर्तन ने पत्रकारिता को अधिक सुलभ और व्यापक बना दिया। साथ ही, पाठकों की भूमिका भी बदलने लगी। वे केवल समाचार ग्रहण करने वाले नहीं रहे, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया और विचार भी तत्काल व्यक्त करने लगे। इससे संवाद की एक नई संस्कृति का विकास हुआ।

इक्कीसवीं सदी में सामाजिक माध्यमों के उदय ने इस परिवर्तन को और अधिक तीव्र कर दिया। अब सूचना का प्रवाह केवल समाचार संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामान्य जन भी इसके सक्रिय भागीदार बन गए। कोई भी व्यक्ति अपने विचार, चित्र या दृश्य सामग्री के माध्यम से समाचार का निर्माण और प्रसार कर सकता है। इससे पत्रकारिता का स्वरूप अधिक लोकतांत्रिक हुआ, किंतु इसके साथ ही सत्यता और विश्वसनीयता की चुनौती भी बढ़ी। अनेक बार अप्रमाणित सूचनाएँ भी तीव्र गति से फैलने लगीं, जिससे समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने लगी। इस परिस्थिति में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई, क्योंकि उसे सत्य और असत्य के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना था।

मोबाइल उपकरणों के प्रसार ने पत्रकारिता को और अधिक सरल और त्वरित बना दिया। अब एक छोटे से उपकरण के माध्यम से ही समाचार संकलन, संपादन और प्रसारण संभव हो गया। इससे पत्रकारिता का दायरा और अधिक विस्तृत हुआ और दूरस्थ क्षेत्रों की आवाज भी मुख्य धारा तक पहुँचने लगी। इस परिवर्तन ने हिंदी पत्रकारिता को विशेष रूप से सशक्त बनाया, क्योंकि इससे ग्रामीण और छोटे नगरों के लोग भी अपनी बात व्यापक स्तर पर रख सके। इससे समाचारों की विविधता और प्रतिनिधित्व में वृद्धि हुई, जो एक स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है।

इसी क्रम में तथ्य आधारित विश्लेषण की प्रवृत्ति भी विकसित हुई। अब केवल घटनाओं का वर्णन ही पर्याप्त नहीं रहा, बल्कि उनके पीछे छिपे कारणों और प्रवृत्तियों को समझना भी आवश्यक हो गया। उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर समाचारों का विश्लेषण करने की परंपरा ने पत्रकारिता को अधिक गहराई और विश्वसनीयता प्रदान की। इससे पाठकों को केवल सूचना ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की वास्तविकता को समझने का अवसर भी मिलने लगा। इस प्रकार पत्रकारिता का स्वरूप अधिक बौद्धिक और विश्लेषणात्मक होता गया।

वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धि के विकास ने पत्रकारिता को एक नए युग में प्रवेश कराया है। अब समाचारों का निर्माण, अनुवाद और प्रसार अनेक प्रकार से स्वचालित रूप से संभव हो गया है। इससे कार्य की गति और क्षमता दोनों में वृद्धि हुई है, किंतु इसके साथ ही कई नैतिक प्रश्न भी सामने आए हैं। यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कहीं तकनीकी साधनों पर अत्यधिक निर्भरता पत्रकारिता के मानवीय पक्ष को कमजोर न कर दे। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि इन साधनों का उपयोग निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ किया जाए, ताकि समाज में विश्वास बना रहे।

आज हिंदी पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसके सामने अपार संभावनाएँ हैं, किंतु चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। एक ओर तकनीकी साधनों ने उसे अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है, तो दूसरी ओर सत्यता, विश्वसनीयता और नैतिकता को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक हो गया है। यदि पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्यों—सत्य की स्थापना, समाज की सेवा और जनहित की रक्षा—को ध्यान में रखते हुए तकनीक का उपयोग करती है, तो वह भविष्य में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है। दो सौ वर्षों की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि हिंदी पत्रकारिता ने हर परिवर्तन को स्वीकार किया है और अपने को समय के अनुसार ढाला है। आने वाले समय में भी यदि यह संतुलन बना रहता है, तो हिंदी पत्रकारिता न केवल तकनीकी दृष्टि से समृद्ध होगी, बल्कि समाज के मार्गदर्शन का एक सशक्त माध्यम भी बनी रहेगी।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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