तुम सहज प्रकृति हो
तुम सहज प्रकृति हो
जीने की महज़ आकृति हो
हिमालय की गोद से मचलती मस्त पवन निर्मल ।
नभ के गर्भ से छलकती जीवन सुधा निश्चल जल।।
ये हरियाली ये रास्ते
जीवन के ही वास्ते
तुम स्वयंसिद्ध हो
जीवन में प्रसिद्ध हो
युगों युगों से स्वीकृति हो
तुम सहज प्रकृति हो
जीने की महज़ आकृति हो
सुनहरा चाँदर ओढ़े उदय होता है सूर्य ।
लालिमा की सागर लिए अस्त होता है सूर्य।।
ये सुरज चाँद सितारें
बिजली बादल तारे
जमीं आसमां तुम्हारे
हमारे महज़ प्रवृति हो
तुम सहज प्रकृति हो
जीने की महज़ आकृति हो
सप्त इन्द्र धनुषों का रंग समेटते हुए ।
प्रेम की सप्त सुरों का रंग लपेटे हुए।।
तुम से ही संसार सिखा
इश्क़ मोहब्बत प्यार सिखा
परिंदों से उड़ने की अंदाज़ सिखा ।
जीओ और जीने दो का राज़ सिखा।।
जगत के अनमोल कृति हो
तुम सहज प्रकृति हो
जीने की महज़ आकृति हो
— मनोज शाह मानस
