वात्सल्य रस’ के सम्राट, महाकवि सूरदास
हिंदी साहित्य के दैदीप्यमान नक्षत्र और कृष्ण भक्ति शाखा के अग्रणी कवि महाकवि सूरदास जी का व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय संस्कृति की एक अनमोल धरोहर है, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से ब्रजभाषा काव्य को वह ऊँचाई प्रदान की जो आज भी अद्वितीय मानी जाती है। सूरदास जी को मुख्य रूप से ‘वात्सल्य रस’ का सम्राट कहा जाता है क्योंकि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं और माता यशोदा के साथ उनके निश्छल प्रेम का जो सजीव वर्णन ‘सूरसागर’ में किया है, वह साक्षात परमात्मा के दर्शन के बिना संभव नहीं प्रतीत होता। उनकी अनन्य भक्ति का प्रमाण उनके स्वयं के शब्दों में मिलता है जब वे कहते हैं, “मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवै॥” अर्थात् जिस प्रकार समुद्र के जहाज से उड़ा हुआ पक्षी चारों ओर जल ही जल देखकर अंततः वापस जहाज पर ही आश्रय लेता है, ठीक उसी प्रकार सूरदास का मन भी संसार के अन्य सभी स्थानों पर भटकने के बाद पुनः श्रीकृष्ण के चरणों में ही विश्राम और परम सुख पाता है। वल्लभाचार्य के शिष्य और अष्टछाप के कवियों में प्रमुख स्थान रखने वाले सूर ने न केवल वात्सल्य बल्कि श्रृंगार और शांत रस में भी पदों की रचना की, जहाँ उनका ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग ज्ञान पर भक्ति की विजय का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। उनके पदों में संगीत और काव्य का ऐसा अद्भुत मिश्रण है कि आज सदियों बाद भी उनके भजन जन-जन की जिह्वा पर भक्ति रस घोल रहे हैं, जो हमें यह संदेश देते हैं कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से ईश्वर को अपने भीतर ही अनुभव किया जा सकता है। उनकी जयंती का यह अवसर हमें उनके द्वारा छोड़ी गई साहित्यिक विरासत को संजोने और उनके बताए गए प्रेम मार्ग पर चलकर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, क्योंकि सूरदास का काव्य केवल शब्दों का समूह नहीं बल्कि एक शाश्वत प्रकाशपुंज है जो युगों-युगों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
