शिक्षा एवं व्यवसाय

पढ़ाई को मस्तिष्क पर हावी न होने दें

जैसा कि हम सभी ने देखा है कि अभी-अभी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान ;त्ठैम्द्ध एवं केन्द्रिय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ;ब्ठैम्द्ध के दसवीं एवं बारहवीं कक्षाओं के परीक्षाओं का परिणाम घोषित हुआ हैं। इस वर्ष का परीक्षा परिणाम बहुत ही बेहतरीन रहा। इन परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि बच्चों ने अपनी परीक्षा के लिए बहुत ही शानदार तैयारी की थी। इसके लिए सभी विद्यार्थियों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए ढ़ेरों शुभकामनाएँ तथा माता-पिता एवं गुरुजनों को भी बहुत-बहुत बधाई।
हम सभी को भी अपने जीवन में बचपन से लेकर किसी-न-किसी प्रकार की परीक्षा के दौर से गुजरना ही पड़ा था। एक बात मैं यहाँ उन सभी विद्यार्थियों को कहना चाहूँगा कि परीक्षा चाहे कैसी भी हो उसे अपने मन-मस्तिष्क पर कभी भी हावी न होने दें तथा लोगों की व्यर्थ की बातों एवं फालतु के सुझावों पर तो बिल्कुल भी ध्यान न दे। यहीं चिन्तन करना है कि अपनी परीक्षा की तैयारी उन्हें किस प्रकार से करनी है। परीक्षा का परिणाम चाहे कैसा भी रहें, बिल्कुल भी हताश व निराश नहीं होना है।
प्रायः देखा गया है कि जब भी परीक्षा परिणाम आता है तो पढ़ाई में होशियार-से-होशियार विद्यार्थी को भी लगता है कि उसे अच्छे अंक प्राप्त नहीं हुए। ऐसे कई बच्चें हैं जिनका परीक्षा परिणाम 90 या 95 प्रतिशत तक आया है फिर भी उन्हें ये कम लगते हैं। मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या इस प्रकार के परिणाम आपको कम लगते हैं? प्रायः देखा गया है कि ऐसे अंकों को प्राप्त करने के लिए बच्चें पढ़ाई में जी-जान लगा देते हैं, न तो उनमें खाने का कोई होश रहता है और न ही सोने का। यहाँ तक कि अपनी सुद्धबुद्ध तक खो देते हैं, इसके चलते उनमें अत्यधिक तनाव एवं अवसाद की स्थिति भी अक्सर देखी जा सकती है।
बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। विशेषकर 15 से 18 वर्ष के बच्चों का। उनमें सोचने एवं समझने की शक्ति अपेक्षाकृत कम होती है। इस उम्र में वे अवयस्कता से वयस्कता की ओर बढ़ते हैं। उन्हें यह भान नहीं रहता कि उनके लिए क्या सही है अथवा क्या गलत। वे छोटी-से-छोटी बात को अपने दिल पर ले लेते हैं। इसके चलते वे कई-कई बार तो खुद को हानि पहुँचाने अथवा आत्महत्या करने तक का कदम भी उठा लेते हैं।
प्रायः देखा गया है कि अभिभावकों द्वारा बचपन से ही उनके मन में एक बात बैठा दी जाती है कि तुम्हें डॉक्टर, इंजीनियर अथवा प्रशासनिक अधिकारी बनना हैं। और कई-कई बार तो उनके द्वारा बच्चों की योग्यता, रुचि एवं क्षमता को जाने बगैर अपने निजी अथवा दूसरों के नजरिये से उन्हें किस क्षेत्र में जाना है या उन्हें कौनसे विषय का चयन करना है इसका निर्णय तक भी ले लिया जाता है। परिजनों के इसी दबाव के कारण अक्सर बच्चों को अपनी रुचि एवं प्रतिभा को प्रकट करने का अवसर नहीं मिल पाता जिसके कारण वे कुंठा का शिकार हो जाते हैं। इससे न केवल उनका बचपन प्रभावित होता है और जब वयस्क हो जाते है तब भी वे इस सोच को अपने मन-मस्तिष्क से निकाल नहीं पाते। इसी अपराधबोध में वे अपना पूरा ध्यान सिर्फ-और-सिर्फ पढ़ाई पर केन्द्रित कर देते हैं। वे न तो किसी के घर जाते हैं और न किसी से बेवजह मिलना-जुलना पसन्द करते हैं।
इसका एक कारण ओर भी है कि परिजन एवं बच्चों के बीच परस्पर संवाद की कमी। इसके चलते अक्सर स्थिति ऐसी बनती है कि बच्चें अपने मन की बात अथवा अपनी निजी समस्या तक भी किसी ऐसे तीसरे व्यक्ति के साथ साझा ;ैींतमद्ध करते हैं जिससे उसके गलत मार्ग अथवा गलत दिशा में जाने की संभावना अत्यधिक रहती है।
सभी माता-पिता एवं गुरुजनों से मेरा निवेदन है कि उन पर पढ़ाई को लेकर अत्यधिक दबाब न बनाएँ। उन्हें न सिर्फ पढ़ाई को लेकर बल्कि किसी अन्य बात पर भी उलहाना न दें। एक बात यहाँ और कहना चाहूँगा कि आपने अपने जीवन में जो-जो प्राप्त नहीं किया उस मानसिकता को उस अबोध बच्चें पर न थोपें। और न हीं उसे यह जताये कि फलां व्यक्ति के बच्चें ने यह हासिल किया या वो हासिल किया। आपके बार-बार उसकी पढ़ाई को लेकर उसे ताने मारना उचित नहीं है। इससे होगा यह कि वह आपको तो कुछ भी नहीं कहेगा लेकिन अन्दर-ही-अन्दर घुटता रहेगा और हो सकता है कि वो किसी मानसिक बीमारी का शिकार तक हो जाए।
अभिभावकों एवं गुरुजनों को मिलकर यह प्रयास करना होगा कि बच्चों की पढ़ाई को उनके मनमस्तिष्क पर हावी होने नहीं देना हैं। उन्हें तनावमुक्त रखना हैं, उनकी भावनाओं, रुचि एवं प्रतिभा को ध्यान में रखकर निर्णय लेना हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उन्हें प्रोत्साहित करते रहना हैं। चाहे वे अपने जीवन में किसी भी क्षेत्र में जाने की रुचि रखते हो। अपनी निजी इच्छाओं को उन पर नहीं लादना हैं।

— राजीव नेपालिया (माथुर)

राजीव नेपालिया

401, ‘बंशी निकुंज’, महावीरपुरम् सिटी, चौपासनी जागीर, चौपासनी फनवर्ल्ड के पीछे, जोधपुर-342008 (राज.), मोबाइल: 98280-18003

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