साहित्य की साधना में ‘स्व’ से ‘सर्व’ की ओर
साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समाज की चेतना का जीवंत दस्तावेज़ होता है। वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति और मीडिया के विस्तार ने रचनाकारों को एक वृहद मंच प्रदान किया है। आए दिन हमारे साथी साहित्यकारों और विदुषी बहनों की उत्कृष्ट रचनाएँ विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाती हैं। यह निर्विवाद है कि एक रचना को पाठक तक पहुँचाने में संपादक और प्रकाशक की भूमिका वंदनीय है, और उन्हें इसका श्रेय मिलना ही चाहिए। किंतु, इस चमक-धमक के बीच एक बुनियादी प्रश्न आज भी अनुत्तरित है, क्या हम एक रचनाकार के रूप में केवल ‘लिखने’ तक सीमित हो गए हैं या हम ‘पढ़ने’ और ‘सीखने’ के संस्कार को भी जीवित रखे हुए हैं?अक्सर यह देखा जाता है कि रचनाकार अपनी रचना के प्रकाशन, उसके संरक्षण और सोशल मीडिया पर उसके प्रचार-प्रसार में तो पूरी ऊर्जा लगा देता है, परंतु जब बात साथी साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ने की आती है, तो वहाँ एक अजीब सा मौन छा जाता है। हमें यह समझना होगा कि कोई भी साहित्यकार अपने आप में ‘पूर्ण’ नहीं है। साहित्य एक अविरल बहती सरिता है, जिसमें हर रचनाकार एक बूंद के समान है। जब हम दूसरे की रचना को ध्यान से पढ़ते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं पढ़ते, बल्कि उस परिवेश, उस संघर्ष और उस दृष्टिकोण को आत्मसात करते हैं जो शायद हमारे अपने अनुभव जगत से ओझल था।
साहित्यिक जगत में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता,यहाँ केवल ‘सृजन’ प्रधान है। एक दूसरे का उत्साहवर्धन करना किसी पर उपकार नहीं, बल्कि स्वयं के विकास का मार्ग है। विशेषकर हमारी लेखिका बहनें, जो घर-परिवार और समाज की दोहरी जिम्मेदारियों के बीच उत्कृष्ट साहित्य का सृजन कर रही हैं, उनकी दृष्टि और संवेदनाओं को पढ़ना हमें जीवन के नए आयाम सिखा सकता है। विचारों का आदान-प्रदान ही वह उर्वरक है, जो साहित्य की जड़ों को सींचता है। यदि हम एक-दूसरे के पूरक बन जाएं, तो वैचारिक दरिद्रता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
अहंकार सृजन का सबसे बड़ा शत्रु है। यह सोचना कि “मुझे अब कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं है”, वैचारिक मृत्यु की ओर पहला कदम है। एक सच्चा रचनाकार वही है जो मरते दम तक विद्यार्थी बना रहे। अपने साथी बंधुओं से सीखना, उनके शिल्प को समझना और उनके भावों का सम्मान करना ही वास्तविक साहित्य साधना है। जब हम एक-दूसरे की रचनाओं पर सार्थक चर्चा करते हैं, तो उससे केवल लेखक का उत्साहवर्धन नहीं होता, बल्कि समाज को एक परिपक्व साहित्य प्राप्त होता है।
आज हमें एक सामूहिक संकल्प की आवश्यकता
है,आज समय की पुकार है कि हम अपनी रचनाओं को सहेजने के साथ-साथ दूसरों की अनुभूतियों को भी ह्रदय में स्थान दें। आइए, हम ‘मैं’ के घेरे से बाहर निकलकर ‘हम’ के भाव को अंगीकार करें। साहित्य की सार्थकता प्रशंसा बटोरने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विचारों को खाद-पानी देकर एक विशाल वटवृक्ष बनाने में है। जिस दिन हम एक-दूसरे की सफलता में अपनी जीत देखने लगेंगे, उसी दिन साहित्य का उद्देश्य सफल होगा।
लेखन की इस पावन यात्रा में हम सब सहयात्री हैं। आइए, एक-दूसरे का संबल बनें, एक-दूसरे के पूरक बनें और सृजन के इस महायज्ञ में अपनी आहुति पूरी विनम्रता के साथ दें।
– डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’
