कविता

सत्य के आलोक में

मन में कई इच्छाऍं
बुद-बुद होती रहती हैं,
अगर उस ओर ध्यान दें तो
हम अपना रास्ता भूल जाते हैं।

चित्त की सहज वृत्ति है कि
द्वंद्व का झंझट बनाये रखना,
संदेहों का जाल बिछाना
सरल नहीं होता सही कदम लेना।

सभी को बुद्ध बनना
संभव नहीं होता
सुख – भोग का त्याग करना,
गहरे चिंतन का
मीठा फल है विराग।

शाश्वत सत्य की खोज करना
उसकी पंखुड़ियों को
अपने अंदर विकसित करना,
यथार्थ का रूप देना
महामानव का कार्य हो गया है।

दूसरे के अधिकारों को छीनना,
अत्याचार, अमानवीय व्यवहार करना,
आत्म प्रकृति का विरुद्ध है
मूढ़-मति की यह विकृति
मनुष्य के पतन का सूचक है।

ज्ञान-शक्ति सर्वव्यापी है,
हर जगह अपना ही रूप है।
खोलें अपनी अंतर-चक्षु
समादर, समता-बंधुता, भाईचारा
भव्य गुणों का स्वाद लेते रहें।

जहॉं चित्त शांत है,
सत्य के आलोक में
जीवन का व्यापार है,
दूसरों को खिल-खिलाते
मनुष्य खिलता है,
वहॉं इस जीवन का सूत्र है।

— पैड़ाला रवींद्र नाथ।

पी. रवींद्रनाथ

ओहदा : पाठशाला सहायक (हिंदी), शैक्षिक योग्यताएँ : एम .ए .(हिंदी,अंग्रेजी)., एम.फिल (हिंदी), सेट, पी.एच.डी. शोधार्थी एस.वी.यूनिवर्सिटी तिरूपति। कार्यस्थान। : जिला परिषत् उन्नत पाठशाला, वेंकटराजु पल्ले, चिट्वेल मंडल कड़पा जिला ,आँ.प्र.516110 प्रकाशित कृतियाँ : वेदना के शूल कविता संग्रह। विभिन्न पत्रिकाओं में दस से अधिक आलेख । प्रवृत्ति : कविता ,कहानी लिखना, तेलुगु और हिंदी में । डॉ.सर्वेपल्लि राधाकृष्णन राष्ट्रीय उत्तम अध्यापक पुरस्कार प्राप्त एवं नेशनल एक्शलेन्सी अवार्ड। वेदना के शूल कविता संग्रह के लिए सूरजपाल साहित्य सम्मान।