सत्य के आलोक में
मन में कई इच्छाऍं
बुद-बुद होती रहती हैं,
अगर उस ओर ध्यान दें तो
हम अपना रास्ता भूल जाते हैं।
चित्त की सहज वृत्ति है कि
द्वंद्व का झंझट बनाये रखना,
संदेहों का जाल बिछाना
सरल नहीं होता सही कदम लेना।
सभी को बुद्ध बनना
संभव नहीं होता
सुख – भोग का त्याग करना,
गहरे चिंतन का
मीठा फल है विराग।
शाश्वत सत्य की खोज करना
उसकी पंखुड़ियों को
अपने अंदर विकसित करना,
यथार्थ का रूप देना
महामानव का कार्य हो गया है।
दूसरे के अधिकारों को छीनना,
अत्याचार, अमानवीय व्यवहार करना,
आत्म प्रकृति का विरुद्ध है
मूढ़-मति की यह विकृति
मनुष्य के पतन का सूचक है।
ज्ञान-शक्ति सर्वव्यापी है,
हर जगह अपना ही रूप है।
खोलें अपनी अंतर-चक्षु
समादर, समता-बंधुता, भाईचारा
भव्य गुणों का स्वाद लेते रहें।
जहॉं चित्त शांत है,
सत्य के आलोक में
जीवन का व्यापार है,
दूसरों को खिल-खिलाते
मनुष्य खिलता है,
वहॉं इस जीवन का सूत्र है।
— पैड़ाला रवींद्र नाथ।
