आत्म-मंथन
मैं–मैं में नहीं, मुझसे हूँ।हिम्मत नहीं है मुझमेंफिर भी कहूँगी।समझ नहीं है मुझमेंफिर भी लिखूँगी।अक्सर लोग निकाल देते हैंमेरे विचार
Read Moreचेहरे की चमक पलभर में,समय कभी भी हर लेता है,चरित्र का उजियारा लेकिन,युग-युग तक साथ रहता है।रूप नहीं, व्यवहार बताता,इंसान
Read Moreरोज मिल रहे हैं बस नए-नए ज़ख्म,किसे कहें अपना दर्द खुलकर हम,आम आदमी तो टूट रहा है हर दिन,दैनिक जीवकोपार्जन
Read Moreकिसी की जमीर परलात-घूसा मत मारोउम्र में छोटा हैकमजोर समझ करतीर मत चलाओबच्चा समझकरमां को अपमानित करोगेसत्ता का चाबुक चलाओगेज्यादती
Read Moreएतवार अब टूट रहा शादी के बंधन से सात की क्या कहें एक जन्म का बंधन ही भारी हो रहा
Read Moreनिहार रहा था वह, अश्वत्थ की झूलती डाल।अनिल-झंझा के संग, जो मिला रही थी ताल।।उत्पन्न, पल्लवित जिस पर, पर्ण हुआ
Read Moreहृदय के भीतरन जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।विचार कभी ग्रह बनकरपरिक्रमा करते हैं,कभी टूटते तारों-सेबिखर जाते हैं। कुछ स्मृतियाँ चाँद
Read Moreहे नवांकुरो!घबड़ाना मतलिखते रहनाकलम को मजबूत रखनामत डरना आलोचनाओं से सच लिखना तुमएक दिन तुम भीआग की भट्टी सेपककर निकलोगे
Read Moreकिसी को दुःख देना, एक ऐसा क़र्ज़ है,जिसका हिसाब रखता स्वयं सृष्टि का फ़र्ज़ है।समय की अदालत में हर कर्म
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