कविता

मैं जीना चाहती थी

मैं जीना चाहती थी अपने सपनों के साथ
जहाँ कोई न हो सिर्फ प्रेम हो
जो मुझे दुनिया के हर दर्द से दूर ले जाये
और कहता तुम परेशान मत होना मैं हूँ न

मैं रोना चाहती थी सर रखकर
उन मजबूत कंधों पर
जो कभी मुझे कमजोर न पड़ने दें
और कहता तुम अकेली नहीं मैं हूँ न

मैं चलना चाहती थी उस हाथ को पकड़कर
जो कभी मुझे एक पल भी अकेला न छोड़े
और कहता तुम डरो मत
तुम अकेली ही काफी हो बाकी मैं हूँ न

मैं चल रही थी यूँ ही अकेली अपने सफर में
हिम्मत का चिराग़ जलाए
ठोकरों से दोस्ती कर ली थी
मैंने आँसूओं को चुपचाप गले लगाये

“फिर एक दिन आईने ने धीरे से कहा
क्यों उदास हो किसकी तलाश में हो
जिसे तुम ढूँढती रहीं संसार में
वो आवाज़ तुम्हारे भीतर ही थी… मैं हूँ न।”

— वर्षा वार्ष्णेय

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017

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