मैं जीना चाहती थी
मैं जीना चाहती थी अपने सपनों के साथ
जहाँ कोई न हो सिर्फ प्रेम हो
जो मुझे दुनिया के हर दर्द से दूर ले जाये
और कहता तुम परेशान मत होना मैं हूँ न
मैं रोना चाहती थी सर रखकर
उन मजबूत कंधों पर
जो कभी मुझे कमजोर न पड़ने दें
और कहता तुम अकेली नहीं मैं हूँ न
मैं चलना चाहती थी उस हाथ को पकड़कर
जो कभी मुझे एक पल भी अकेला न छोड़े
और कहता तुम डरो मत
तुम अकेली ही काफी हो बाकी मैं हूँ न
मैं चल रही थी यूँ ही अकेली अपने सफर में
हिम्मत का चिराग़ जलाए
ठोकरों से दोस्ती कर ली थी
मैंने आँसूओं को चुपचाप गले लगाये
“फिर एक दिन आईने ने धीरे से कहा
क्यों उदास हो किसकी तलाश में हो
जिसे तुम ढूँढती रहीं संसार में
वो आवाज़ तुम्हारे भीतर ही थी… मैं हूँ न।”
— वर्षा वार्ष्णेय
