कविता

मूल

सूद मूल से प्यारा होता।
कौन चाहकर इसको खोता।।
भला भलाई दुनिया जाने।
बात भला कब किसकी माने।।

आज मूल से कटते जाते।
करते तरह-तरह की बातें।।
सबकी अपनी है मजबूरी।
इसीलिए तो बढ़ती दूरी ।।

मूलभूत सुविधाएँ गायब।
नाहक बनो आप मत नायब।।
शासन सत्ता की मजबूरी।
कभी नहीं चाहे वो दूरी।।

मूलमंत्र है बहुत जरूरी।
चाहे जितनी हो मजबूरी।।
पथ से भटक आप मत जाना।
तर्क वितर्क से मत घबराना।।

मूल आपसे दूर न होता।
यादों का बोझा है ढोता।।
भले आप उसको बिसराएँ।
मौन अश्रु भी नजर न आएँ।।

मूलभूत सुख सुविधा चाहें।
भरना पड़े कभी न आहें।।
जिम्मेदारी नहीं उठाएँ।
औरों को दोषी ठहराएँ।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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