मनोरथ
करो मनोरथ पूरे मेरे।
विपदा मुझको कभी न घेरे।।
इतनी किरपा करना दाता।
मुझे नहीं कुछ भी है आता।।
करूँ न पूजा पाठ आरती।
निंदा नफ़रत मुझको भाती।।
नहीं तुम्हारे दर मैं आऊँ।
कभी न तुमको शीश झुकाऊँ।।
बुद्धि विवेक हीन हूँ भगवन।
पर उपकार भाव है तन-मन।।
जैसी मर्जी वैसा करना।
कभी नहीं मुझको है डरना।।
अपनी लीला तुम ही जानो।
चाहे जैसा मुझको मानो।।
जो मन में था सब कह डाला।
चाह मनोरथ पूर्ण निवाला।।
प्रभो! जगत की रक्षा करिए।
भाव-भक्ति मम उर में भरिए।।
सकल मनोरथ पूरे करना।
सबकी झोली खाली भरना।।
आप जगत कल्याण कीजिए।
भले हमें कुछ नहीं दीजिए।।
बात हमारी मानो दाता।
आप सकल जग प्राण विधाता।।
