कविता

माँ-सा न कोई दूजा

माँ, ममता की मूरत,

माँ, धरा का धीरज,

माँ, ममत्व का आँचल,

माँ, करुणा सागर।।

माँ, प्रभु प्रतिरूप,

माँ-सा न कोई दूजा।

धूप में छाँव शीतल,

जलधार सी निर्मल,

संस्कार से निर्मिति,

सुशोभिता संस्कृति।।

माँ, जीवन शिल्पकार,

माँ-सा न कोई दूजा।।

पत्थर को पारस बनाये,

सुरमई संगीत राग सिखाये,

माँ, गुरु, माँ अटल विश्वास,

बालमन का परिमल, उल्लास।।

माँ, जीवन आधार,

माँ-सा न कोई दूजा।।

माया, दुलार सरिता,

सर्वस्व लुटाये ममता,

मुस्कान शिशु की मनभाये,

तृप्त हॄदय, खिल खिल जाये।।

माँ, सृष्टि पालनहार,

माँ-सा न कोई दूजा।। 

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८