राजनीति

हिंदी के प्रति हीनता और उपेक्षा

हम सभी इस बात से भलीभाँति परिचित हैं कि आधुनिक युग विज्ञान का युग है। हम सभी स्वयं की अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु साइंस और टेक्नालॉजी की ओर तीव्र गति से अग्रसर हो रहे हैं परंतु इसका अर्थ ये तो नहीं कि हम अपने देश की संस्कृति और भाषा को ही भुला दें या इसे अनदेखा, अनसुना करने की गंदी कल्पना भी करें । अक्सर देखा जाता है कि यदि कोई वयकति अंग्रेजी/अन्य भाषा में बात करता है तो उसे खूब वाहवाही मिलती है परंतु यदि वह हिंदी में बात करता है तो उसे अनपढ़, गँवार, जाहिल जैसे कटु शब्दों का सामना करना पड़ता है।मैं पूँछना चाहूँगा कि- “क्या यही है हमारे समाज की सभ्यता? यदि हम अपनी मातृभाषा में बात करते हैं तो हमें निंदा का भागीदार क्यों बनना पड़ता है? राष्ट्रभाषा/मातृभाषा का अभिप्राय उस भाषा से लगाया जा सकता है जिसे “माँ” बोलती है अर्थात जिस भाषा में हमारी माटी की महक आती है। दुःखद तो यह है कि हिंदी मातृभाषा होते हुए भी गुमनाम अँधेरे में कहीं गुम होती जा रही है क्योंकि इसे हमारे द्वारा ही उपेक्षित होना पड़ता है। आज समाज में विशेषकर युवा पीढ़ी की यही सोच है कि- “हिंदी से क्या होगा”? इस पर में यह कहना चाहता हूँ कि- यदि हमारे कार्य हिंदी भाषा में ही पूर्ण न हो रहे होते तो इसे राष्ट्रभाषा/मातृभाषा का दर्जा क्यों दिया जाता?

यदि हम साक्षात्कार में हिंदी भाषा की बात करें तो यहाँ भी यही हाल है। यदि हमने अंग्रेजी में उत्तर दिया तो हमें नौकरी दे दी जाती है परंतु यदि हमने हिंदी में उत्तर दिया तो हमें नौकरी तो मिलती ही नहीं साथ ही समझा जाता है कि साक्षात्कार देने वाले को कुछ नहीं आता। विश्व के चार बहुचर्चित एवं सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में भारत का नाम

और स्थान महत्वपूर्ण होने के बाद भी भारत की जनता द्वारा ही अपनी राष्ट्रभाषा को नजरअंदाज किया जा रहा है जो बिल्कुल भी उचित नहीं है। आजादी के इतने सालों बाद भी आज हिंदी उपेक्षा की शिकार है। हिंदी अपने ही घर में सौतेला व्यवहार झेल रही है। भारत के कुछ राज्यों में तो हिंदी भाषा को लेकर हालात इतने गंभीर हैं कि दंगे फसाद शुरु हो जाते हैं। कई राज्यों के लोग तो हिंदी भाषा को जानते तक नहीं। वे सिर्फ अपनी राजभाषा या अंग्रेजी भाषा में ही बात करना पसंद करते हैं जोकि हमारे लिए बेहद शर्मनाक बात है।

हिंदी राष्ट्रभाषा होते हुए भी एकदम असहाय सी मालूम होती है क्योंकि हिंदी को इस बात का बहुत दुख है कि हिंदी को उसकी जनता का ही साथ नहीं मिल पा रहा है। यदि हम पत्रकारिता की बात करें तो यहाँ भी हिंदी भाषा की उपेक्षा कम नहीं है। एक तरफ जहाँ हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकारों और संपादकों का वेतन बहुत कम है वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकारों और संपादकों को मोटा वेतन दिया जाता है। हिंदी भाषा के पाठकों की संख्या दिन-प्रतिदिन गिरती ही जा रही है। ये हिंदी की अवहेलना नहीं तो और क्या है, जोकि बहुत ही चिंतनीय विषय है।

धड़ल्ले से हिंदी बोलने वाले लोग भी जब किसी माँल की भव्य दुकान के अंदर जाते हैं तो वहाँ घुसने ही “एक्सक्यूज मी” का जयकारा लगाने लगते हैं। जो स्वयं अपनी भाषा, संस्कृति पर तमाचा मारते है। क्या उन भव्य दुकानों की चमक इतनी ज्यादा है कि हमारी मातृभाषा की चमक उसके सामने सामने फीकी पड़ जाती है। आज वक्त आ गया है कि हम हिंदी को विश्वपटल पर एक उच्च स्थान दिलाएँ और हम अपनी पहचान एक हिंदी नागरिक के रूप में उजागर करें।

हिंदी से अनभिज्ञ, प्रबुद्ध वर्ग भी जिसमें अधिकांश हिंदीभाषी वैज्ञानिक, डाकटर, इंजीनियर भी शामिल है। अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिंदी को ओछा समझने लगे। यह भी एक कडवा सत्य है कि हिदीभाषी लोगों की उदासीनता से वह शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं। इसका असर हिंदी साहित्य पर भी देखने को मिल रहा है।

वास्तविकता यह है कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी भी एक विकासशील भाषा है किंतु इस बात को समय-समय पर नकारा जाता रहा है। हिंदी भाषा की हार का अर्थ भारत की अन्य सभी भाषाओं की हार से ठीक उसी प्रकार से लगाया जा सकता है जैसे भारत की हार का अर्थ भारत के सभी प्रदेशों की हार। हिंदी को एक सम्मानजनक पद दिलाने हेतु कई हिंदी संस्थाएँ कार्यरत है किंतु चिंता की बात यह है कि केवल कुछ संस्थाएँ ही अपने कार्य को ठीक तरह से पूरा कर रही हैं, नहीं तो बाकी सिर्फ खानापूर्ति कर रही हैं।

भारतीय संविधान की धारा 351 के तहत भारतीय सरकार का यह कर्तव्य होगा कि हिंदी व हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करें। संविधान की धारा 343 के तहत देवनागरी लिपि में हिंदी भाषा ही राजकीय भाषा होगी। जब हम हिंदी भाषा को शिक्षा के हर विषय और हर स्तर में प्रयोग करने लगेगे तो हिंदी भाषा स्वयं ही अपना स्थान प्राप्त कर लेगी।

विकाश सक्सेना 

5 thoughts on “हिंदी के प्रति हीनता और उपेक्षा

  • मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ।

  • विकास जी आपका लेख अतिउत्तम है | आपको अनन्त बधाइयाँ इस लेख के लिए परन्तु मैं इसमें यह भी अवश्य जोड़ना चाहूंगा कि हर कार्य का आरम्भ यदि स्वयं से ही किया जाये तो उसकी सार्थकता बढ़ जाती है |
    हिन्दी को हम सब मिलकर ही उसके उचित स्थान तक पहुँचा सकते हैं और इसके लिए हमारा प्रथम प्रयास होना चाहिए कि हम आरम्भ स्वयं से करें, स्वयं की त्रुटियों को सुधारें और अपनी भाषा को गौरवमयी बनायें

    • विजय कुमार सिंघल

      मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ, अक्षांस जी।

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छा लेख ! आपने जो लिखा है, उसकी पुष्टि पेरिस से आया ‘बिटिया का पत्र’ करता है. हमें अपनी भाषा के प्रति और अधिक समर्पित होने की आवश्यकता है.

  • अपनी भाषा को पियार करना चाहिए . फ्रैंच लोग आप से फ्रैंच में ही बात करेंगे , वोह तब ही इंग्लिश बोलेंगे जब उन को जरुरत होगी , इसी तरह जैपनीज अपनी भाषा को पियार करते हैं , हम में अह्सासे कमतरी है .

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