गीतिका/ग़ज़ल

वादा

तेरे प्यार के महल में, वादे तमाम करना
हो जाऊँ कैद उसमे ,कुछ इंतजाम करना

धड़कन की हो दीवारें,साँसों की हो कतारें
सो जाऊं मैं सुकूँ से,दिले-एहतिमाम करना

मदहोश आसमां में ख़्वाबों का चाँद देखू
रातों के आईने को, मेरा सलाम करना

काँटो से है घरौंदे,मखमल सी है अदाएं
आगोश में सनम के,शबे-ऐहतराम करना

रोती है देखो कब तक”मुस्कान”इन लबों की
ख़ामोशी के जहाँ को,तुम कोहराम करना

निर्मला”मुस्कान”

एहतिमाम-प्रबन्ध

निर्मला 'मुस्कान'

निर्मला बरवड़"मुस्कान" D/O श्री सुभाष चंद्र ,पिपराली रोड,सीकर (राजस्थान)