सामाजिक

लेख– क्रिकेट के अलावा देश में दूसरे खेलों को भी प्रोत्साहन मिलना आवश्यक

युवा भारत और महिलाओं की गूंज आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में बंपर ऑफर के साथ दिखी, क्योंकि इस बार राष्ट्रमंडल खेल में भारत के हिस्से में 66 पदक आएं। यह देश के लिए गौरव की बात है। पर जिस देश में खेल-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए अरबों रुपए बहाए जाते हैं। वहां पर पूनम यादव ने जो आप बीती बताई। वह हमारे देश में पुष्पित और पल्लवित होती खेल संस्कृति के बीच अगर एक हकीकत है। फ़िर यक्ष प्रश्न यहीं इतने सारे पैसों का खेल, खेल के नाम पर कैसे हो जाता है। पूनम यादव को अगर भारोत्तोलन की तैयारी कराने लिए उनके अभिवावकों को भैंस तक बेचनी पड़ी। इसके अलावा पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतने के बाद घर पर लोगों को मिठाई खिलाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। साथ में तैयारी के दरमियान अगर उसे कई- कई दिनों तक भूखे रहना पडा। फ़िर हमारे देश का सियासी तंत्र कितना भी इठला ले, इस बार पदक संख्या 66 को देखकर। लेकिन कुछ यक्ष प्रश्न तो अभी भी बने हुए हैं। जिसका उत्तर ढूढ़ना होगा। तभी बेहतर खेल-नीति देश में उपज सकेंगी, और पदकों की संख्या सैकड़ों में होगी।

पूनम यादव की व्यथा कोई किसी अकेले खिलाड़ी का दर्द नहीं। ऐसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे देश में। ऐसे में पूनम यादव की व्यथा और विभिन्न राज्यों द्वारा अरबों रुपए खेल के नाम पर ख़र्च करने के बीच उपजे सवाल पर ध्यान केंद्रित करें। तो पहला सवाल यहीं। जब अन्य खेलों के प्रति देश के युवाओं आदि की रुचि है, फ़िर मात्र अकेले क्रिकेट को बढ़ावा क्यों मिल रहा देश में? अनेक राज्य खेल के नाम पर अनेक योजनाएं चलाते हैं। अच्छा-खासा पैसा फूंकते है। तो कहीं यह पैसा सिर्फ़ अधिकारियों के विदेशी सैर-सपाटे पर तो नहीं उड़ेले जा रहें। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस प्रतिभा को तलाशने की बात होती है। वह देश में क्रिकेट को छोड़कर अन्य खेलों के प्रति दिखती नहीं। वरना 131 करोड़ की आबादी को सिर्फ़ 66 पदक ज्यादा नहीं लगते, क्योंकि इंग्लैंड जैसा देश जहां की जनसंख्या सिर्फ़ दस करोड़ है। उसकी झोली में तीन सौ से अधिक पदक जाते हैं।

आज हमारा देश बेरोजगारी की खान बनता जा रहा है। फ़िर बेहतर खेल संस्कृति विकसित कर उसे रोजगार की शक़्ल में तब्दील करने की मुहिम क्यों नहीं होती देश में। हम वैश्विक फ़लक़ पर हर पहलू में आज की वर्तमान स्थिति में अन्य देशों के बराबर ख़ड़े मामूल पड़ते हैं। या फ़िर विश्व हमारा लोहा मानता है। इस स्थिति में हम अगर खेल को ले ले। तो चंद खेलों को छोड़कर अन्य खेल प्रतिस्पर्धाओं में हम पिछड़ क्यों जाते हैं। ओलंपिक जैसे खेल महाकुंभ में हम अंगुली पर गिने जा सकने भर की संख्या में पदक क्यों जीत पाते हैं। ऐसा तो नहीं हमारे देश में प्रतिभा नहीं। जब हमारे देश में 15 वर्ष का लड़का स्वर्ण पदक ला सकता है। फ़िर हमारा देश तो विश्व में सबसे अधिक युवाओं की आबादी का देश है। उसे सिर्फ़ माहौल और सुविधाओं की आवश्यकता है। हमारा देश गांवो का देश भले है, लेकिन ऐसा नहीं कि गांव में प्रतिभाएं जन्म नहीं लेती। आज पूनम जैसी तमाम लड़कियां मिल जाएंगी, जो भूखी रहते हुए देश को पदक दिलाने की लालसा रखती होगी। लेकिन पर्याप्त संसाधनों के अभाव में उनका सपना अधूरा रह जाता है। हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, कमी है तो संसाधनों की। कमी है, तो रहनुमाई सोच की। कमी है तो गांवो की तरफ़ न देख पाने की।

बहनों ने पूनम को अगर अपने हिस्से का दूध और रोटी इसलिए दिया। ताकि वह देश का नाम और झंडा बुलंद कर सकें। तो देश की रहनुमाई व्यवस्था का कर्तव्य भी बनता है, कि ऐसे लोगों के लिए पर्याप्त बन्दोबस्त करें। पूनम जैसे खिलाड़ियों की देश में लंबी फ़ौज मिल जाएंगी, जो ख़ुद और परिवार के सहयोग से ख़ुद को तराश रहीं। आज के दौर में राष्ट्रमंडल खेलों में भी सरकारी महकमा अपनी नीतियों से अलग नहीं दिखता। खिलाड़ियों को फीजियो की सुविधाएं सही से मयस्सर नहीं हो पाती। गिनती के चिकित्सक साथ होते हैं। लेकिन खिलाड़ी से अधिक अधिकारी और उनके परिजन खेलगाँव का हिस्सा बन जाते हैं। यह देश की खेलनीति और खिलाड़ियों का दुर्भाग्य से ज़्यादा कुछ नहीं। आज के समय में देश के भीतर उन खिलाड़ियों की जितनी तारीफ़ों के पुल बांधा जाएं वह कम है। जिन खिलाड़ियों ने सरकारी उपेक्षा के बाद भी देश को पदक दिलाया है, क्योंकि आज के दौर में हम नई खेल नीति की बात तो करते हैं। पर वह भी राजनीति से प्रेरित है। जहां पर चयन में व्यापक स्तर पर गड़बड़झाला होता है। साथ में खिलाड़ियों को ज़रूरत की वस्तुएं भी मुकम्मल नहीं हो पाती। तो अब वक़्त की मांग पुकार रहीं, कि देश के हर गांवो में खेल की नर्सरियां स्थापित हो। जहां से बिना किसी भेदभाव और राजनीति से प्रेरित होकर स्वछंद रूप से अच्छी प्रतिभा को निखारने का सरकारी प्रयास हो। इत्ती सी कामयाबी जो आस्ट्रेलिया में हुए राष्ट्रमंडल खेल में भारत को मिली है। उसे देखकर फूलकर कुप्पा होने की जरुरत नहीं। हां देश ख़ुशी को मनाए, लेकिन खेलों की दिशा में अभी व्यापक स्तर पर सुधार की आवश्यकता है। वह बात नज़र अंदाज़ न हो। राज्य व केंद्र सरकार को खेलों के क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता है। खेल सिर्फ़ नाम और पैसे कमाने का वैश्विक स्तर का जरिया नहीं, बल्कि किसी भी देश या समुदाय के खुशहाली और स्वास्थ्य का प्रतीक भी हो सकता है। तो अब राष्ट्रमंडल में मिले पदकों की ख़ुशी देश मनाएं, पर हर घर हर गांव से खेल प्रतिभा को उत्पन्न करने का संकल्प हमारी व्यवस्था ले, क्योंकि क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के प्रति रहनुमाई अनदेखी के कारण हमारे देश में अन्य खेलों की प्रतिभाओं का दमन चक्र शुरू हो गया था। जो सही नहीं था युवा वर्ग के लिए न देश और समाज के लिए।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896