सामाजिक

देश को हैशटैग मत करो !!

इस समय देश में सुलगाए गए मुद्दे मानवीय भावनाओं के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील हैं, लेकिन इन पर संवेदनाएं जताने वालों की भावनात्मक शुद्धता का प्रतिशत कितना परिशुद्ध है, इसे स्वयं उनसे बेहतर कोई नहीं समझता। यह तो सुनिश्चित है कि वे जो देश के मुद्दों पर अपने समय और स्थान की चयनात्मक सहूलियत के मुताबिक मुद्दों और विषयों को तूल देने की गम्भीरता समझते हैं, वे भलीभांति यह भी जानते हैं कि लोकतंत्र में किन शब्दों को हैशटैग करके उसे भीड़तंत्र में परिवर्तित किया जा सकता है।

शब्द हैशटैग होते जाते हैं, लिंक जुड़ते जाते हैं और भीड़ इकठ्ठी होती जाती है, सड़कों पर, ऐतिहासिक इमारतों पर और धार्मिक उन्माद फैला सकने वाली संवेदनाओं से जुड़े स्थलों पर। कितने खुश तो हैं देश के करोड़ों वे लोग, जिनके पास इन संवेदनाओं को मुद्दा बनाने और उनको हैशटैग करके दूरदूर तक फैलाने का अपना अलग अंदाज़ और आनंद है। देश के पास कोई काम ही नहीं है, कितने मजे में तो हैं हम, हमारे युवा, हमारे बच्चे, हमारे बूढ़े, हमारी स्त्रियां, हमारी बच्चियां, हमारी अर्थव्यवस्था और हमारी राजनीति। फुरसत न होती, तो क्या सोशल मीडिया यूं महिमा मण्डित हो पाता। फुरसत न होती तो क्या एक ही तस्वीर करोड़ों बार हैशटैग के साथ दोहराई न जाती और फुरसत न होती तो सप्ताहों महिनों तक एक ही चयनात्मक मुद्दे को घोल घोलकर गरमी में शरबत की मानिंद पीने का लुत्फ न उठाते।

सत्ता और असत्ता के द्वंद में फंसा देश वास्तविक संवेदनाओं के लिए तरस रहा है। स्वयं को अमर्यादित बनाए जाने के प्रश्नों के उत्तर खोज रहा है। नाटकीय अनशनों, उपवासों और असत्य सत्याग्रहों के गढ़े नए मायनों के विक्षिप्त और विकृत स्वरुपों के लिए मानवीय संवेदनाओं के गले घुटते देख रहा है। दो पक्ष बन जाते हैं और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त लोग अपने अपने पसंद की रस्सी का छोर पकड़कर खेलने लगते हैं रस्साकशी का खेल। मालूम है गिरा कोई किसी को नहीं पाएगा, क्योंकि दोनों बराबरी से हैशटैग करना सीख गए हैं। मूर्ख तो जनता है, जो अपना कीमती समय इनके दिल बहलाने में बरबाद कर रही है, क्योंकि जनता के मन से भी धीरे धीरे देश जैसा कोई भाव मर सा गया है। दिमाग में कुछ इनेगिने से वे ही शब्द जैसे दलित, सवर्ण, आरक्षण, बलात्कार, किसान, सूखा, गरीबी, विरोध आदि आदि घूमते रहते हैं, सुनाई देते रहते हैं, वीडियो और फोटो के माध्यम से आंखों के सामने से गुजरते रहते हैं और एक मनोवैज्ञानिक रोगी की तरह लगता है, देश बस इन्हीं चुनिंदा शब्दों के आसपास घूम रहा है और तो कुछ हो ही नहीं रहा है।

वे जिन्होंने इस मनोवैज्ञानिक सम्मोहन से लोगों को बांध रखा है, वे थोड़ा बहुत इतर जाकर सैर सपाटे कर आते हैं और सम्मोहन सीमा समाप्त होने के पहले वापस आकर फिर पेण्डुलम हिलाने लगते हैं। लोकतंत्र झूलने लगता है सत्तापक्ष बहुत बुरा है या कि फिर नहीं सत्ता ठीक है। फिर घूमने लगते हैं हैशटैग किए शब्द और पैदा होने लगती हैं पीड़िताएं, आत्मदाह, कैंडल मार्च, रैलियां, लोगों से मेल मिलाप, लेकिन सब कुछ कितना संवेदनाहीन बिल्कुल सतही और लोलुपता की भिनभिनाहट भरा हुआ है।

जागो जनता, सम्मोहन से ऊपर उठो, बच्चे हमारे हैं, पीढ़ियां हमसे हैं, बरसों से विभिन्न धर्मों के पड़ोसी और उनका हमारी देहरियों से बिना हिचक आना जाना हमारी प्रीति की संवेदनाएं हैं। यहां किसी ने किसी को कभी दलित नहीं कहा, किसी को सवर्ण नहीं कहा, हमने गांवों से लेकर टोलों मोहल्लों की गलियों में सबके बच्चों को लड़ते झगड़ते खेलते देखा है, सबको आपस में खाते पीते देखा है, किसी ने कब किसका शोषण किया मालूम नहीं, सिवाय इसके कि एक बात को कैसे हैशटैग करके फैलाया जा सकता है। अब जरुर मिलते हैं तो डरते से हाथ मिलाते हैं और नजरों को झुकाकर बातें करते हैं, किसी बात को करते करते कतराने से लगते हैं। क्या लोकतंत्र सिर्फ वोटों और विरोध के शब्दों का हैशटैग बनकर रह जाना है।

जागो देश, उनके किए हैशटैग शब्दों के लिंकों से स्वयं को मुक्त करो और लिंक करना ही है तो संवेदनाओं के लिंक जोड़ो, जैसे पहले थे। सुनो, सत्ता की लोलुपता के शिकार लोग, तुम बलात्कारों को और वीभत्स मत बनाओ। बच्चियों और स्त्रियों के प्राकृतिक कोमल मनों में और डर मत बैठाओ। इतना भी मत गिरो, कि अपने ही देश में अपने अस्तित्व को न ढूढ़ पाओ।

उठो युवाओ, हैशटैग करना ही है, तो  देश के उत्थान, विकास, तकनीकी, विज्ञान, खेल, कला, संस्कृति, साहित्य, अनमोल विरासतों का करो। विशुद्ध मन से देखोगे तो लगेगा और भी बहुत कुछ है देश में सिवाय इसके कि गड़े मुर्दे उखाड़ो, जख्मों को कुरेदो और नमक मिर्चियां डालो, वो कैसे मरा, उस समय कितने दंगे हुए, साल में कितने बलात्कार हुए, शहादत में धर्म की प्रतिशतता क्या है, इस सबके आंकड़े कुछ नहीं देते, हां किसी को सत्ता दे सकते हैं, किसी की सत्ता छीन सकते हैं। पर आप सत्ता नहीं हैं आप देश के वास्तविक कर्णधार हैं। देश की इन अव्यवस्थाओं के बीच स्वयं को स्वयं से ऊपर उठाते हुए वैश्विक सोच को हैशटैग करना है। उनकी संगत से दूर रहो जो स्वयं से ऊपर कुछ सोच नहीं पाते, वे देश या विश्व के बारे में क्या सोच पाएंगे?

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली)द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्राके साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है। इसी वर्ष सुभांजलि प्रकाशन द्वारा डॉ. पुनीत बिसारिया एवम् विनोद पासी हंसकमल जी के संयुक्त संपादन में प्रकाशित पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न कलाम साहब को श्रद्धांजलिस्वरूप देश के 101 कवियों की कविताओं से सुसज्जित कविता संग्रह "कलाम को सलाम" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताएँ शामिल हैं । साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में डॉ. मिश्रा के हिन्दी लेख व कविताएं प्रकाशित होती रहती हैं । डॉ शुभ्रता मिश्रा भारत के हिन्दीभाषी प्रदेश मध्यप्रदेश से हैं तथा प्रारम्भ से ही एक मेधावी शोधार्थी रहीं हैं । उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से वनस्पतिशास्त्र में स्नातक (B.Sc.) व स्नातकोत्तर (M.Sc.) उपाधियाँ विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त की हैं । उन्होंने विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से वनस्पतिशास्त्र में डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की है तथा पोस्ट डॉक्टोरल अनुसंधान कार्य भी किया है । वे अनेक शोधवृत्तियों एवम् पुरस्कारों से सम्मानित हैं । उन्हें उनके शोधकार्य के लिए "मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक पुरस्कार" भी मिल चुका है । डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।