कविता

वागीश्वरी सवैया

वागीश्वरी (सात यगण+लघु गुरु) सरल मापनी — 122/122/122/122/122/122/122/12, 23 वर्ण

“वागीश्वरी सवैया”

उठो जी सवेरे सवेरे उठो जी, उगी लालिमा को निहारो उठो।

नहा लो अभी भाप पानी लिए है, बड़े आलसी हो विचारो उठो।

कहानी पढ़ी है जुबानी सुनी है, सुहानी हवा है सँवारो उठो।

दवा से भली है सुबा की जुगाली, चलाओ पगों को हँकारो उठो।।

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ