लघुकथा

लघुकथा – सौभाग्यशाली

कोमल स्नेह। वाट्सएप पर तुम्हारा मैसेज पढ़कर बस रो पड़ी। नहीं कोमल बहन तुम अपशगुनि नहीं हो। जीजाजी की आखिरी सांस तक तुमने तन मन धन से उनकी सेवा की। सौभाग्यशाली पत्नी को ही पति की सेवा करने का अवसर मिलता है। रुढिवादि समाज रिश्तेदारों की नकारात्मक प्रतिक्रिया पर ध्यान मत दो। मेरी माँ सुहागिन का प्रशस्ति पत्र लेकर अनन्त यात्रा पर चली गई और मेरे पिता को मेरे भाई भाभी की दया पर छोड़ गई। पापा से मिलने गई तो उनकी दुर्दशा देखी नहीं गई। पति परमेश्वर की अनुमति लेकर तत्काल में रिजर्वेशन करवाकर अपने साथ ही लेकर आई। तुमने विधवा होकर कोई पाप नहीं किया है। मेरी माँ ने सुहागिन जाकर कोई पुण्य नहीं कमाया है। मेरी बेटी की शादी में तुम्हें अवश्य शामिल होना होगा। तुम्हारा आशीर्वाद लेकर ही ज्योति ससुराल के लिए विदा होगी। शेष मिलने पर  —— सस्नेह ममता।

दिलीप भाटिया

*दिलीप भाटिया

जन्म 26 दिसम्बर 1947 इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और डिग्री, 38 वर्ष परमाणु ऊर्जा विभाग में सेवा, अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक अधिकारी