गीतिका/ग़ज़ल

पछतावा

किसी को सता कर जिये तो क्या जिये,
किसी को रुला कर जिये तो क्या जिये।
करता रहा तुम पर भरोसा अटूट हर पल,
उसी को आजमां कर जिये तो क्या जिये।
किया जिंदगी की जमा-पूंजी नाम तुम्हारे,
उसे घटिया बता कर जिये तो क्या जिये।
जिसके अश्रुधार बहे सिर्फ तुम्हारे ही लिए,
उसे नजरों से गिरा कर जिये तो क्या जिये।
किया जो कुछ,सब तुम्हारी खुशी के लिए,
उसी का दिल दुखा कर जिये तो क्या जिये।
लहू के रिश्ते जैसा ही रिश्ता था जब उससे
रिश्ते में दाग़ लगा कर जिये तो क्या जिये।
— आशीष तिवारी निर्मल

*आशीष तिवारी निर्मल

व्यंग्यकार लालगाँव,रीवा,म.प्र. 9399394911 8602929616