कविता

कविता

मौसम हुआ गुलाबी बिखरे रंग गुलाल

धरती भी है रंग गयी हरी गुलाबी लाल।
सारे साजन फिर रहे ले गुलाल की थाल
मिलते ही सजनी रंगे उसके गोरे गाल।
दहके फूल पलाश के वन में लगी है आग
सुनो हवा भी गा रही कोई फागुनी राग।
बजने लगे ढोल संग झांझ और मृदंग
बनी राधिका ग्वालिनें अपने कान्हा संग।
 रंगे बिना छोड़े नहीं एक भी मुखड़ा आज
रंग बिरंगे मुखड़ा लिए फिरने में क्या लाज।
रंग बिन रंगहीन हैं जीवन के सारे चित्र
भेदभाव सारे मिटा बन जायें सब मित्र।
— अमृता राजेन्द्र प्रसाद

अमृता जोशी

जगदलपुर. छत्तीसगढ़