कहानी

सूरजो बाई

सूरजो बाई एक सुडौल गठीले बदन की सुंदर सी महिला थी। उसकी झोपड़ी के सामने वाली सड़क में सेठों के जो इमारतें और बंगले हैं, वहाँ की कोई भी बहू या लड़की सुंदरता में उसके मुकाबले कहीं नही ठहरती थी। सूरजो का पति ठेला चलाता था। उसकी मित्र मंडली में भी सारे गांजा और भाँग पीने वाले लोग थे।
सूरजो आसपास घरों में झाड़ू बर्तन का काम करती थी। उन घरों में दो-तीन अधिकारी, एक कारखाने वाला और दो तीन घर तो राजनीति में अच्छे खासी दखल रखने वाले थे। सूरजो के शरीर सौष्ठव की चर्चा सेठों के घर की औरतों में भी होती थी। उन्हें डर था कहीं उनका पति इसका दीवाना न हो जाए। लेकिन सूरजो अपने घर-परिवार और काम के प्रति वफादार थी।
सूरजो का पति ठेला चलाता और देशी शराब का शौकीन था। रात में उसकी झोपड़ी में रोज महफिल जमती, जो उसके ही गाँव के लोग और साथी ठेला चलाने वाले होते थे, लेकिन मोहल्ले में दबी जुबान में यह चर्चा भी होती थी कि सूरजो स्प्रिट पिलाने का काम करती थी। जिस समय की यह बात है उस समय स्वास्थ्य विभाग द्वारा जनहित में जारी नोटिस को सभी मेडिकल की दुकानों के सामने में लगाना अनिवार्य होता था। उस नोटिस में दो हड्डियों के बीच एक खोपड़ी का प्रतीक चिन्ह बना होता और लिखा रहता” सावधान स्प्रिट पीने से मौत हो सकती है।”
सूरजो सात घरों में काम करती थी। उसका उठना बैठना मगर सिर्फ़ दो ही घरों में था, जिनसे वह सलाह लेती थी। एक घर नगर निगम के एक अधिकारी का था और दूसरा एक कारखाने वाले का था, जिसके यहाँ कटीले तार बनते थे।
सूरजो की एक ही लड़की थी वह भी सूरजो की तरह बहुत सुंदर थी। नौ साल की उसकी बेटी तारा चौथी कक्षा में पढ़ती थी। कभी- कभी वह सूरजो के साथ चली जाती थी। उन घरों के बच्चों के साथ वह भी खेलती। एक दिन कारखाने वाले सेठ की मालकिन ने कहा” सूरजो शीला की शादी तय हो गईं है। अब वह विदेश जाएगी।”
“कहाँ मेम साहब”
“बहुत दूर, अमेरिका के शहर में।” मालकिन ने कहा।
“आप गई है मेम साहब?
“कहाँ रे। साहब भी नहीं गए हैं वहाँ” मालकिन ने सोफे में बैठते हुए कहा।
“आप खुश नहीं हैं” सूरजो बोली
“खुशी तो है, पर बेटी को दो तीन साल या हो सकता है कि पाँच साल भी नहीं देख सकते।”
“फिर मेम साहब।”
“साहब ने तय कर दिया है, वहीं करना पड़ेगा।” मालिकन ने कहा। फिर थोड़ा सा रुककर बोली” सूरजो तेरी बेटी को अगर उसके साथ भेज दे तो? तू अपने पति से पूछ लेना। वह वहाँ अमेरिका में रहकर पढ़ेगी। वहाँ के नियम हिसाब से नौकरों को पढ़ाना जरूरी है।”
“मैं पूँछ कर बताऊँगी मेम साहब।” सूरजो अपना काम निपटा कर वापस घर आ गई। रात को उसने अपने पति से उसने इस विषय में पूछा” एक ही बेटी है, उसे अपने से कैसे दूर रखें।” पति ने कहा।
“अच्छा निगम वाले साहब से पूंछ लेते हैं।” सूरजो ने कहा।
“हमारी बेटी है, उनसे क्या पूछना” पति ने कहा।
“तुम तो अनपढ़ हो, मैं भी अनपढ़ हूँ। बेटी को मैं नौकरानी का काम नहीं करने दूँगी।” सूरजो ने पति को जवाब में कहा।” मैं तो साहब से जाकर बात करुँगी।
दूसरे दिन सूरजो श्रीवास्तव जी के घर के घर काम पर गईं तो श्रीवास्तव जी की पत्नि जो स्कूल में शिक्षका थी उनसे बोली” मैडम जी, एक बात करनी है।”
“क्या बात है।” श्रीवास्तव जी की पत्नि ने कहा। सूरजो ने माणिकलाल जी की पत्नि ने जो। कहा था वह को बता दिया।
श्रीवास्तव जी और उनकी पत्नि ने दोनों ने उसकी बात सुनी। श्रीवास्तव जी ने कहा” सूरजो मैं माणिकलाल जी से जाकर बात कर लूँगा। लेकिन एक बात है वे तो अपनी बेटी को देखने साल में दो बार जा सकते हैं, पर तुझे तो अपनी बेटी कम से कम चार साल बाद ही देखने मिलेगी।”
“सोच लो। अपने मरद से भी पूछ ले। आखिर वो उसका बाप है।” श्रीवास्तव साहब ने कहा।
सूरजो को थोड़ा संतोष हुआ कि चलो बड़े साहब ही ढंग से बात कर लेंगे तो अच्छा रहेगा।
श्रीवास्तव जी एक दिन समय निकाल कर ने माणिकलाल जी के कार्यालय गए। वे तो मोहल्ले के थे, उन्हें अच्छा लगा कि श्रीवास्तव की राय सूरजो ने ली है। माणिक लाल जी ने बताया कि वह घर के सदस्य की तरह उसे रखा जाएगा। उसकी पढ़ाई भी वहीं के नियम के तहत की जाएगी। वहाँ सरकार की नियम व शर्तें हैं, वह मानने पर ही वहाँ रहा जा सकता है।
श्रीवास्तव जी ने कहा कि लेकिन वह अपनी बेटी से कब और कितने समय बाद मिल सकती है। माणिकलाल जी ने कहा” कि हम भी दो तीन साल बाद ही जा सकते हैं। बिटीया की फोटो जरूर मंगा लिया करेंगे” श्रीवास्तव जी उनकी बातों संतुष्ट हो वापस चले आए।
दूसरे दिन सूरजो जब अपने काम करने आई तो श्रीवास्तव जी ने उससे साफ कहा” देख सूरजो माणिकलाल जी ने मुझे बिलकुल साफ कहा है कि वे खुद दो-तीन साल में एक बार जा पायेंगे। हाँ फोटो अवश्य मंगा सकते हैं, साल में दो या तीन बार। अब तुम अपने पति से पूछ लो आखिर वो उसका पिता है। लड़की अमेरिका में पढ़-लिख लेगी। यह बहुत बड़ी बात है, अच्छे खासे लोग वहाँ जाकर नहीं पढ़ सकते हैं।”
सूरजो को विश्वास हो गया कि श्रीवास्तव साहब अच्छी तरह समझ कर आएं हैं। अब अपने पति से पूछकर वह फैसला ले लेगी। उसने किसी तरह पति को मना लिया। माणिकलाल के घर जाकर उसने अपनी बेटी को भेजने की सहमति दे दी। माणिकलाल जी ने कहा था पूरी तरह सोच कर बताना। भेजने के पहले सरकारी कागजी कार्यवाही करनी पड़ती है, पासपोर्ट बनाना पड़ता है,वह सब सूरजो के समझ से परे था। उसे तो बस यह पता था कि उसकी बेटी दूसरे देश में जाकर पढ़ेगी।
लड़के वाले जयपुर के थे जो माणिकलाल के होने वाले समधी बनने वाले थे। सूरजो की सहमति के छह सात माह बाद विवाह की तारीख निकली। जयपुर से रायपुर छत्तीसगढ़ बारात आई। विवाह सम्पन्न होने के बाद सूरजो ने भारी मन से माणिकलाल की बेटी के साथ अपनी बेटी को भी विदा किया।
यहाँ से जाकर उनके अमेरिका जाने की तारीख तय थी। कोई बीस दिन बाद वे जयपुर से रवाना हो जाएंगे।
जयपुर से अमेरिका जाने के ठीक एक दिन पहले माणिकलाल की पत्नि ने सूरजो को ट्रंककाल से फोन से बात कराई। बेटी ने अपने कुशल मंगल होने की सूचना दी। सूरजो ने अपने जीवन में पहली बार फोन से बात की थी। वैसे भी उस समय बड़े सस्थानों औऱ उद्योगपति के यहाँ फोन होते थे या सरकारी कार्यालय में होते थे।
छह महीने बाद माणिकलाल के बेटी के विवाह का एल्बम आया, उसके ससुराल वालों ने जयपुर से भेजा था। सूरजो ने वह मालकिन के साथ देखा। अगले छह महीने बाद अमेरिका से भी फ़ोटो आया उसके दामाद ने भिजवाया था, जिसमें तारा सूरजो की बेटी भी थी। कोई ग्यारह महीने बाद ट्रंककाल आया माणिकलाल ने अपने दामाद औऱ बेटी से बात की। भारत और अमेरिका में समय का भी बहुत फर्क है। माणिकलाल जी सूरजो को बता दिया था कि यहाँ दिन रहता है तो वहाँ रात रहती है।
धीरे- धीरे समय बीतता गया। माणिकलाल जी ने एक दो बार सूरजो को भी बात करवाया जब वह उनके यहाँ काम कर रही थी और ट्रंककाल आ गया था। सूरजो की बेटी अब वहाँ अमेरिका में रम गई थी। माणिकलाल की बेटी को गए तीन साल हो गए थे।
“एक दिन माणिकलाल जी ने बताया कि उसकी बिटिया ने मिडिल स्कूल पास कर ली है, अब वह हाई स्कूल चली गई। माणिकलाल की बेटी के दो बच्चे भी हो गए थे। सूरजो की बेटी उनको देखती उनके साथ वह भी परिवार के सदस्य की तरह थी। बच्चों को खिलाना ही उसका काम था। तारा को माणिकलाल जी बेटी ने अपने परिवार के सदस्य की तरह ही रखा था।
पाँच साल बीत गए उसके दामाद और बेटी को देखने माणिकलाल जी और उनकी पत्नि गए और एक माह बाद जयपुर होकर वापस आए। सूरजो की बेटी अब बड़ी हो गई थी।
समय धीरे धीरे बीत रहा था। सूरजो का मन बैचेन हो उठा था,उसे अब अपनी बिटिया को सामने से देखने का मन था। इसी बात पर पति से उसका झगड़ा हो जाता। एक दो बार श्रीवास्तव साहब भी गए माणिकलाल जी से मिलने।
माणिकलाल जी ने बताया कि ” बेटी दामाद भी कहाँ आए हैं, बेटी के ससुराल वाले भी दो बार उनसे मिलने गए हैं अमेरिका। दामाद भी शादी के बाद जयपुर अकेले ही आया और एक ही हप्ते में चला गया। हमारी अपनी बेटी भी हमारे पास कहाँ आ पाई है श्रीवास्तव जी।”
दस वर्ष बीत गए थे। माणिकलाल जी सूरजो को बताया कि उड़की बेटी ग्रेजुएट हो गई थी। बेटी और दामाद भी रायपुर आने वाले हैं दो महीने बाद। सूरजो को खुशी तो हुई चलो बेटी अब आकर उसके पास रहेगी। किसी तरह दो महीने निकल गए। और वह दिन भी आ गया जब जयपुर से माणिकलाल की बेटी के साथ उसकी बेटी तारा भी आ गई। वह बहुत ही सुंदर दिखने लगी थी। माणिकलाल जी और उनकी पत्नि उसे देखकर बहुत आश्चर्य लग रहा था। तारा अब अमेरिकाके वातावरण में पूरी तरह रम गईं थी।
जिस दिन आई उस समय सूरजो भी वहीं थी। माणिकलाल जी की पत्नि ने कहा” तारा ये तेरी मम्मी है।”
“हैलो मम्मी” बोलकर तारा उनकी बेटी के साथ ऊपर चली गईं। सूरजो को बहुत ही बुरा लगा। माणिकलाल जी की पत्नि ने समझाया” सूरजो अभी तो वह आई है। अब यही रहेगी तो सब पहले की तरह ही हो जाएगा। “
“अपनी बेटी अब अपनी नहीं रह गई है,लगता है मालकिन”
“अरे हमारी बेटी आई है कि नहीं हमारे पास”
मालकिन बोली।
“आपकी बेटी की बात अलग है मालकिन, वह तो पहले भी महल जैसे घर में थी, अभी भी है। लेकिन मिट्टी के घर वाले को एक बार महल मिल जाए तो वह मिट्टी के घर वापस कहाँ जाएगा मालकिन। यह बात मेरे समझ में पहले नहीं आईं, लेकिन जिस तरह से इतने साल बाद अपनी माँ से मिली अब मेरी नहीं रही वह।”
सूरजो इतना कहकर रोने लगी। माणिकलाल जी की पत्नि ने उसे ढाढ़स बँधाया, और स्वयं सोच में पड़ गई कि उनसे गलती तो हो ही गईं है।
एक दो बाद दिन माणिकलाल जी उनकी पत्नि और बेटी तीनों ने मिलकर तारा को समझाया कि उसका असली घर वही है। अब उसे वहीं रहना चाहिए। तारा थोड़ा सा सामान लेकर माणिकलाल की पत्नि और बेटी के साथ अपने घर गई। घर पास ही था। मोहल्ले में भी जानकारी हो गई थी कि सूरजो की लड़की अमेरिका में पढ़ कर आई है। आसपास के लोग बड़ी उत्सुकता से सूरजो की बेटी को देख रहे थे,जब वह अपने घर पहुँची। अपने सामान के साथ वह हाथ में अंग्रेजी उपन्यास भी रखी थी। मोहल्ले में वह कौतुक का विषय हो गई थी। उसके पिता के साथ ठेला चलाने वाले साथी के बच्चे सोच रहे थे तारा उन्हें पहचान जाएगी। लेकिन उसने किसी को भी नहीं पहचाना। वह पूरी तरह अमेरिका के वातावरण में रम गई थी।

माणिकलाल जी की लड़की और बेटी उसे छोड़कर आ गए। थोड़ी देर वह बैठी रही। जब तक वह बैठी रही उनके माँ बाप को लगा तारा अपने आप को अपमानित महसूस कर रही है। वह उपन्यास पढ़ती रही। माँ बाप से बात भी नहीं की। आधे घंटे बाद ही वह फिर से माणिकलाल के घर वापस आ गई। माणिकलाल के पूछने पर उसने वहाँ रहने से इन्कार कर दिया। माणिकलाल को लगा तारा अब गले की हड्डी बन गई है। सबने बहुत समझाया तारा नहीं मानी। वह अमेरिका में ठाट-बाट से रहने की आदी हो गई थी। वहाँ रहकर उसका अपने माता-पिता का मोह खत्म हो चुका था। माणिकलाल जी की बेटी पंद्रह बीस दिन रहने के बाद वापस जयपुर चली गई, कुछ दिनों बाद उसे वापस अमेरिका वापस लौटना भी था।

सूरजो ने माणिकलाल के घर आना-जाना बंद कर दिया था। इधर माणिकलाल बड़ी मुसीबत में फंस गए थे। आखिर वे तारा का क्या करें।

माणिकलाल जी के कारखाने के उत्पादन बहुत से शहरों में सप्लाई होता था। बहुत से व्यापारी उसके यहाँ आते-जाते थे। संयोग से एक दिन भिलाई का एक व्यापारी उनके यहाँ व्यपार के सिलसिले में मिलने आया। उसके साथ एक नौजवान भी था। वह माणिकलाल जी से बहुत समय से वह व्यापार कर रहा था।
“माणिकलाल जी और क्या हालचाल है?
“आप ही कहिए सुरेश जी बहुत समय बाद हमारी याद आई” माणिकलाल उन्हें बैठने के लिए आग्रह किया। फिर घंटी बजा कर नौकर से पानी लाने को कहा।
माणिकलाल जी ने सुरेश से कहा” आपने इनका परिचय नहीं कराया”
“बस यह भी घर का बच्चा है। इसकी नौकरी भिलाई स्टील प्लांट में लग गई है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई इसने नागपुर से की है।”
“घर का बच्चा मतलब” माणिकलाल जी ने पूछा।
“मतलब यह कि इसकी माँ हमारे परिवार के सदस्य की तरह थी। पिछले महीने ही वह चल बसी। तीस सालों तक उसने मेरे माता-पिता और सभी की बहुत सेवा की। उसका कोई नहीं था। अब यह हमारी जिम्मेदारी है।”
माणिकलाल जी को लगा कि शायद उसकी समस्या का समाधान होने वाला है। उनके दिमाग में तारा का विचार आया कि अगर तारा का सम्बंध इस लड़के से हो जाए तो।
“सुरेश जी एक मिनट आइए ना” वे उनको अंदर ले गए अपने घर के, उन्हें तारा के विषय में जानकारी दी। फिर उन्होंने आवाज लगाई” तारा,इधर आना”
तारा तुरंत चली आई। तारा को सुरेश जी ने देखा, उन्हें तारा अच्छी लगी।” तारा ये हैं सुरेश जी। हमारे बहुत पुराने परिचित हैं। आँटी से कहना वो नाश्ता लेकर आए तुम भी साथ आना।
तारा घर के नाश्ता नौकर के साथ नाश्ता लेकर आई। साथ में माणिकलाल जी की पत्नि भी आई। माणिकलाल जी ने कहा” ऑफिस में जो
बैठें हैं उन्हें नाश्ता दे आओ। तारा बेटा अपने हाथ से देना।”
तारा नौकर के साथ नाश्ता लेकर ऑफिस में देंने चली गई।” लीजिए नाश्ता कीजिए।” तारा ने प्लेट युवक के सामने रख दिया।
“अंकल जी कहाँ है” युवक ने पूछा
“आ रहे हैं, अंदर हैं।” तारा ने कहा औऱ अंदर चली गई।
अब सुरेश जी और वह युवक दोनों तारा को देख चुके थे। माणिकलाल जी ने उस युवक को भी अंदर बुलवा लिया। माणिकलाल जी अंदर चले गए। अभी उस कमरे में सुरेश और वह युवक थे।
सुरेश जी ने युवक से पूछा” मनोज तुम्हें ये लड़की कैसी लगी?
“कौन लड़की?” मनोज ने
मनोज को आश्चर्य हुआ” कैसी लगी मतलब मैं समझा नहीं।”
“तुम्हें अपना घर बसाना है कि नहीं?”
“आप अचानक कैसे कह रहें है, मैं क्या बताऊँ।
आप मेरे सब कुछ हैं। यह निर्णय आपका है।”
सुरेश जी उसके इस विचार से बहुत ही खुश हुए। उन्होंने माणिकलाल जी को आवाज लगाई।
“माणिकलाल जी आइए।”
माणिकलाल जी कमरे में आए तो उन्होंने कहा
“यह हमारा बेटा मनोज कह रहा कि मैं जो भी निर्णय लूँगा इसे स्वीकार है। अब मैं इसकी चाची अपनी पत्नि को लेकर आऊँगा और सीधे उसी दिन सबकुछ तय हो जाएगा। वैसे हम दोनों की तरफ से हाँ है।”इतना कहकर वे आराम से बैठ गए।
माणिकलाल जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सूरजो को खबर दी लेकिन सूरजो को उतनी खुशी नहीं हुई। शादी के बाद भी उसकी बेटी उन्हीं के यहाँ आएगी, सूरजो के झोपड़ी तो नहीं आने वाली।
सूरजो माणिकलाल के यहाँ नही गई। उसका मन फट चुका था, हृदय पत्थर का हो चुका था।

हप्ते भर बाद माणिकलाल के सुरेश जी मनोज के साथ अपने पूरे परिवार को लेकर आए तो सूरजो को खबर भेजी, सूरजो फिर भी नहीं आई। माणिकलाल जी ने श्रीवास्तव जी से मिलकर उन्हें जानकारी तारा और मनोज के विषय में बताया, वे बहुत खुश हुए। श्रीवास्तव जी ने कहा कि” हम सूरजो से कहेगें कि वो तारा को आशीर्वाद देने आ जाए।”
माणिकलाल जी के यहाँ तारा के विवाह की तैयारी शुरू हो गई। माणिकलाल जी अपने कुछ खास लोग औऱ मोहल्ले के कुछ गिने चुने को ही विवाह में बुलाने का विचार किया। उन्होंने सूरजो औऱ उसके पति से भी पूछा कि अपने किन लोगों को विवाह में बुलवाना है तो वह बता देना लेकिन सूरजो और उसके पति ने कोई भी इच्छा नहीं जताई। माणिकलाल जी को लग रहा था किसी तरह विवाह संपन्न हो जाए। मोहल्ले में भी दिखाना था कि उनकी प्रतिष्ठा जो है वह बनी रहे। कुछ दिनों बाद देवउठनी के पहले ही मुहूर्त में उन्होंने तारा का विवाह धूमधाम से कर दिया। माणिकलाल जी की मोहल्ले में वाहवाही भी खूब हुई। माणिकलाल जी ने सुरेश जी के परिवार से सूरजो के परिवार को मिलवाया। सूरजो को कोई भी उत्साह नहीं दिखा क्योंकि उसकी बेटी तारा उनको अपना मान ही नहीं रही थी। सूरजो का परिवार सेठ के विवाह में जैसे नौकर लोग उपस्थित रहते हैं वैसी ही उपस्थित थी। विदा होते तक सूरजो और उसका पति थे। बेटी के विदा होते ही वे आ गए। लेकिन उस रात माणिकलाल और सूरजो का परिवार दोनों ही की आंखों में नींद नहीं थी। सूरजो और माणिकलाल जी ने तारा को तो विदा कर दिया था लेकिन तारा के साथ ही उनकी आँखों की नींद भी विदा हो गयी थी। माणिकलाल जी अपने को भवँर में फँसे महसूस कर रहे थे जिसमें से निकलने में उन्हें बहुत समय लग गया।
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— सुधीर कुमार सोनी

सुधीर कुमार सोनी

सभी प्रमुख समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में कविताएँ व कहानियाँ प्रकाशित। दो कविता संग्रह प्रकाशित । एक कहानी संग्रह व कविता संग्रह प्रकाशन प्रक्रिया में। संपर्क अंकिता लिटिल क्राफ्ट सत्ती बाजार ,रायपुर छत्तीसगढ़ मोबाइल 98261 74067

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