सामाजिक

बचपन का आकर्षण

अतीत हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है। बचपन की स्मृतियों की ओर बार- बार मुड़ जाना हमें अच्छा लगता है। छूट गई चीजों से मोह उमड़ना इंसानी फितरत है । जब बचपन का घर, गांव, शहर, देश छूट जाता है तो व्यक्ति जीवन में एक बार उस शहर, देश गांव में जरूर लौटना चाहता है । इसी तरह बचपन के खेल-खिलौनों को देखकर उसके भीतर का बच्चा कुलबुला उठता है । तितलियों के पीछे भागना, पानी में छपाक-छपाक कूदना, गुड़िया – गुड्डों से खेलना जैसी बातों की स्मृति उसे आनंद से भर देती है । बचपन के इस आकर्षण को बढ़ा में जीने के लिए दुनिया में एक नया चलन चला है, जिसे ‘किडल्टिंग’ नाम दिया गया है। इसके जरिए दुनिया भर में कई युवा, अधेड़ और बुजुर्ग महिलाएं, पुरुष वह सब कर रहे है जो बचपन में करना उन्हें पसंद था, या जवानी में समय के अभाव के कारण वे कर नहीं पाए। ‘किडल्टिंग’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना हुआ है- ‘किड’ और ‘एडल्ट’ । यानी बचपन और वयस्क की संधि ।

मनोवैज्ञानिक कार्ला मैरी मैनली के अनुसार, ‘व्यावहारिक रूप से देखें तो यह बचपन की जानी- पहचानी, अच्छी लगने वाली गतिविधियों की ओर एक स्वाभाविक, सरल वापसी है।’ मतलब बचपन में जिस लुका-छिपी के खेल को खेलकर हम रोमांच से भर उठते थे, उसी रोमांच को फिर से बुढ़ापे में खेलकर यह महसूस करने की कोशिश है। ‘किडल्ट’ शब्द का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों से हो रहा है, लेकिन इस चलन की लोकप्रियता में वास्तविक उछाल कोविड महामारी के शुरुआती महीनों में आया, जब सब अपने-अपने घरों में बंद पड़े भय और अवसाद से जूझ रहे थे । इस भय और निराशा को कम करने के लिए कुछ लोगों ने नए शौक पाले तो कुछ अपने पुराने बिछड़े शौक की ओर लौट आए। जब महामारी का भय कम हुआ, तब भी वयस्कों ने ऐसी गतिविधियां जारी रखीं ।

मतलब बचपन के शौक से जीवन में आए उत्साह को बनाए रखा। जब हम अपना मनपसंद काम करते हैं तो जीवन की चिंताओं से बेफिक्र हो जीते हैं। जो नहीं हुआ है, उसकी चिंता करना और जो हो गया है, उसकी भी चिंता करना हमारा स्वभाव होता है। इन चिंताओं के चलते हम जीवन के उल्लास से लगभग महरूम हो जा रहे हैं। ‘किडल्टिंग’ जिंदगी के भागमभाग में फंसे, अकेले रह गए या अवसाद से जूझ रहे लोगों को बहुत पसंद आ रहा है। इस संदर्भ में ‘जाय फ्राम फियर’ की लेखक कार्ला मेरी मैनली का कहना है, ‘पसंदीदा गतिविधियां करना अक्सर तनाव दूर करने के लिए एकदम सही विकल्प होता है।’ बड़ी कंपनियां भी ऐसी गतिविधियों के चलन को बढ़ावा देने में तेजी से जुट गई हैं। लंदन और मैड्रिड में एक संवाद संग्रहालय ‘डोपामाइन लैंड’ अपने ‘अंदर के बच्चे’ को जगाने के लिए बचपन और वयस्क अवस्था के संधिकाल की गतिविधियां करवाता है। एम्स्टर्डम में हर उम्र के लोगों के लिए बना संवाद संग्रहालय साहसी लोगों को गुलाबी मार्शमैलो के समुद्र गोता लगाने और दीवारों पर अगड़म – बगड़म कुछ भी लिखने या चित्र बनाने की सुविधा देता है। यूनाइटेड किंगडम के तीन शहरों में वयस्कों के लिए एक विशाल बाल पिट जहां हर महीने हजारों लोग मजे लेने के लिए आते हैं। दिन भर मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन से ऊबे हुए कामकाजी लोग इससे दूरी बनाने के दिलचस्प बहाने खोजने लगे हैं। बचपन की दुनिया में वापसी उन्हें पसंद आ रही है, क्योंकि इसमें वे उस बीते समय को जीते हैं, जब अधिकतर लोगों के पास मोबाइल और कंप्यूटर नहीं था ।

आखिर कुछ तो कारण होगा कि अपनी वर्तमान जिंदगी में तमाम सुविधाओं के बीच रहने वाले लोग भी अब ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं, जिसमें वे जीवन की संवेदनाओं का अहसास नहीं कर पाते ! जो इसकी वजहें ढूंढ़ पाने और उसके समाधान की ओर साहस के साथ देखने की कोशिश करते हैं, वे अपने बचपन की दुनिया में मौजूद जीवन – तत्त्व में इसका हल खोजते हैं। अमेरिकी समाचार वेबसाइट ‘हफपोस्ट’ के अनुसार, पुरानी यादों को ताजा करने वाली गतिविधियों में शामिल होने से मन की सेहत सुधरती है। ‘इमोशन’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन की ‘मानें तो पुरानी यादें आत्म – निरंतरता को प्रोत्साहित करती हैं, यानी अतीत और वर्तमान के बीच भावनात्मक संबंध को बनाए रखती हैं। जानकारों का कहना है कि ‘किडल्टिंग’ हमें कुछ पलों या घंटों के लिए ही सही, बचपन के उन सरल दिनों में लौटने का अवसर देता है, जो हमें खुशी देते थे। एक खबर यह भी आई थी कि लंदन स्थित ‘डोपामाइन लैंड’ जैसी जगहें खुश करने वाले हारमोन डोपामाइन को भी सक्रिय कर रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ समय पहले कहा था कि कोविड महामारी में वैश्विक स्तर पर चिंता और अवसाद के ‘ मामलों में पच्चीस फीसद की बढ़ोतरी हुई है। इसलिए लोगों को खुश रहने के विकल्प तलाशने चाहिए । कई मनोवैज्ञानिक वयस्कों को चिंतित या तनावग्रस्त होने पर आपस में खेल खेलने, चित्रकारी करने, मिट्टी से मूर्तियां बनाने आदि का सुझाव देते हैं। शुरुआत में यह चिंताओं या जिम्मेदारियों के बोझ से बचने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन समय बीतने पर ये गतिविधियां हमें विस्मय की भावनाओं से भरने लगती हैं, क्योंकि शौक पूरा करते हुए साधारण चीजों को भी हम नए नजरिए से देखने लगते हैं, जिसमें जिज्ञासा, आनंद और कल्पना हो। ऐसी गतिविधियों से हमारे व्यवहार में सहजता बढ़ती है । हमारे अंदर अच्छा महसूस कराने वाले हारमोन होते हैं। यहां तक कि हमारी सोच और समझ व्यवस्थित होती है ।

— विजय गर्ग 

विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

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