तेरा साथ
इन हाथों में तेरा हाथ चाहती हूं
जिंदगी में तेरा साथ चाहती हूं
थक गई हूं सफर अकेले करते-करते
अब तो कदम कदम पर तुझसे मुलाकात चाहती हूं
क्या ही कहूं ऐसी जिंदगी का
जो साथ रहते हुए भी अकेलापन महसूस करें
अपनों की भीड़ में बेगाना बेगाना सा रहने लगे
जो कभी भी खत्म ना हो ऐसी जज्बात चाहती हूं
अब तो हर कदम पर तुझसे मुलाकात चाहती हूं
जिंदगी में तेरा साथ चाहती हूं
दिन के उजालों में तो कहीं ना मिला मुझको
चांदनी रात और सुहानी शाम चाहती हूं
अब तो हर कदम कदम पर तुझसे मुलाकात चाहती हूं
जिंदगी में तेरा साथ चाहती हूं
इन हाथों में तेरा हाथ चाहती हूं।।
— डॉ. सरिता चौहान
