हिमालय पिघला तो प्रभावित होगा आधा एशिया
हिमालय को केवल दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला मानना उसके महत्व को बहुत छोटा करके देखना होगा। हिमालय एशिया की जीवन रेखा है। इसकी बर्फीली चोटियों और हिमनदों से निकलने वाली नदियां करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों लोगों के जीवन को सहारा देती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी विशाल नदी प्रणालियां हिमालय के हिमनदों, हिमपात और वर्षा से पोषित होती हैं। यही कारण है कि हिमालय में होने वाला कोई भी बड़ा परिवर्तन केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव खेतों, शहरों, उद्योगों, बिजलीघरों और आम लोगों के घरों तक पहुंचता है। आज यही हिमालय जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर बदलाव से गुजर रहा है और इसके हिमनदों का तेजी से पिघलना पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है।
हिमालय तथा हिंदूकुश क्षेत्र में हजारों हिमनद मौजूद हैं। यह क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद बर्फ और हिम का सबसे बड़ा भंडार माना जाता है। इन हिमनदों से निकलने वाला पानी एशिया की प्रमुख नदी घाटियों को जीवन देता है। अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र के अनुसार इस क्षेत्र के हिमनदों और हिमपात पर लगभग 2 अरब लोगों की जल सुरक्षा निर्भर है। हिमनदों का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे पानी का विशाल भंडार हैं, बल्कि इसलिए भी है कि वे वर्ष भर नदियों में पानी के प्रवाह को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषकर गर्मियों और वर्षा से पहले के महीनों में हिमनदों से मिलने वाला पानी कृषि और घरेलू आवश्यकताओं के लिए बेहद उपयोगी होता है।
लेकिन बढ़ते तापमान ने इस प्राकृतिक व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। तापमान बढ़ने से हिमनदों का बर्फीला क्षेत्र सिकुड़ रहा है। कई स्थानों पर हिमनद पीछे हट रहे हैं और उनके सामने या आसपास पानी जमा होकर नई झीलें बन रही हैं। कुछ पुरानी हिमनद झीलों का आकार भी लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण यही है कि इन झीलों में जमा पानी प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ाता है। यदि बर्फ, पत्थर और मिट्टी से बनी यह प्राकृतिक दीवार टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है। ऐसी घटना को हिमनद झील विस्फोट बाढ़ कहा जाता है।
हिमनद झील विस्फोट बाढ़ सामान्य बाढ़ से अलग होती है। सामान्य बाढ़ में पानी धीरे-धीरे बढ़ सकता है, जिससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का कुछ समय मिल जाता है। इसके विपरीत हिमनद झील के अचानक टूटने पर पानी अत्यंत तेजी से नीचे की घाटियों में पहुंचता है। रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, घर, खेत, बिजली परियोजनाएं और अन्य निर्माण इसकी चपेट में आ सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की संकरी घाटियां इस खतरे को और गंभीर बना देती हैं क्योंकि पानी के बहाव को फैलने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिलता।
हाल के वर्षों में हिमालय में ऐसी घटनाओं ने खतरे की गंभीरता को स्पष्ट किया है। वर्ष 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से जुड़ी हिमनद झील विस्फोट बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई थी। इसके बाद सिक्किम में कई उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों की पहचान की गई। अब वहां जोखिम का आकलन, जल निकासी और प्रारंभिक चेतावनी जैसी व्यवस्थाओं पर अधिक जोर दिया जा रहा है। हाल की घटनाओं ने हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति क्षेत्र में भी चिंता बढ़ाई है। गेपन झील के संभावित खतरे को देखते हुए प्रशासन ने 32 संवेदनशील स्थानों की पहचान की है और प्रारंभिक चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी की जा रही है।
नेपाल में हाल की विनाशकारी घटना ने इस संकट को और गंभीर रूप से सामने ला दिया है। हिमालयी क्षेत्र में हिमनद और चट्टानों के अस्थिर होने तथा अचानक आने वाली बाढ़ ने बड़े पैमाने पर जान-माल को नुकसान पहुंचाया। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तापमान में वृद्धि के साथ हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों से जुड़ी बाढ़ का खतरा आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है। नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी हिस्से इस खतरे से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
इस संकट का दूसरा पक्ष भी कम गंभीर नहीं है। हिमनदों के पिघलने से शुरुआत में नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन जब हिमनद लगातार छोटे होते जाएंगे तो लंबे समय में शुष्क मौसम के दौरान नदियों में पानी कम होने का खतरा बढ़ेगा। इसका सीधा असर कृषि पर पड़ेगा। जिन क्षेत्रों में सिंचाई का आधार हिमनद और हिमपात से मिलने वाला पानी है, वहां किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है। पानी की कमी खाद्य उत्पादन को प्रभावित करेगी और इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।
जल-विद्युत क्षेत्र के लिए भी हिमालयी बदलाव गंभीर चेतावनी है। भारत, नेपाल और भूटान में अनेक जल-विद्युत परियोजनाएं पर्वतीय नदियों पर निर्भर हैं। यदि अचानक हिमनद झील विस्फोट बाढ़ आती है तो बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ निर्माणाधीन बांध, सुरंगें, पुल और विद्युत व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। हाल की हिमालयी आपदाओं ने दिखाया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बनी आधारभूत संरचनाओं को केवल सामान्य बाढ़ के आधार पर सुरक्षित मानना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य की योजनाओं में हिमनद झीलों, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के संयुक्त खतरे को शामिल करना होगा।
हिमालय का संकट केवल पानी और आपदा तक सीमित नहीं है। हिमनदों के पीछे हटने से पर्वतीय पारिस्थितिकी भी बदल रही है। वनस्पतियों, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों की जीवन पद्धति पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। पहाड़ों में रहने वाले लोगों की आजीविका कृषि, पशुपालन, पर्यटन और स्थानीय जल स्रोतों से जुड़ी होती है। यदि जल स्रोतों का स्वरूप बदलता है तो उन्हें अपने पारंपरिक जीवन और रोजगार के तरीकों में बदलाव करना पड़ सकता है। इसीलिए हिमालयी जलवायु संकट को केवल पर्यावरण की समस्या समझना उचित नहीं होगा। यह सामाजिक और आर्थिक संकट भी है।
एक और चिंताजनक संकेत हिमपात में कमी है। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में वर्ष 2025 लगातार तीसरा ऐसा वर्ष रहा जिसमें मौसमी हिमपात सामान्य से कम रहा। अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र ने इसे जल सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी माना था। हिमपात कम होने का अर्थ केवल पहाड़ों पर कम बर्फ होना नहीं है। इसका प्रभाव आने वाले महीनों में नदियों और जल स्रोतों के प्रवाह पर भी पड़ सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले हिमनद झीलों की नियमित निगरानी आवश्यक है। उपग्रह चित्रों, दूरसंवेदी तकनीक, मौसम संबंधी आंकड़ों और जमीन पर किए जाने वाले वैज्ञानिक निरीक्षणों को एक साथ जोड़ना होगा। जिन झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है, वहां जलस्तर की निरंतर निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी व्यवस्था होनी चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की स्पष्ट योजना भी तैयार करनी होगी।
इसके साथ ही भारत, नेपाल, भूटान और चीन के बीच हिमालय से संबंधित वैज्ञानिक आंकड़ों का नियमित आदान-प्रदान जरूरी है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं। ऊपर पहाड़ों में हुई घटना का प्रभाव नीचे दूसरे देश में भी पहुंच सकता है। इसलिए जल और आपदा प्रबंधन को केवल राष्ट्रीय विषय मानने के बजाय क्षेत्रीय सहयोग के रूप में देखना होगा। हिमालयी देशों को साझा निगरानी तंत्र, संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययन और एक-दूसरे को समय पर चेतावनी देने की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र ने भी हिमनद, हिमपात और स्थायी रूप से जमी भूमि की क्षेत्रीय निगरानी के लिए समन्वित व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण समाधान फिर भी वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना है। यदि दुनिया जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम नहीं करती और वायुमंडल में बढ़ती ताप बढ़ाने वाली गैसों को नियंत्रित नहीं करती तो हिमालयी संकट को पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा। हिमालय को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है। इसका अर्थ एशिया की नदियों, खेतों, जंगलों, जैव विविधता और करोड़ों परिवारों के भविष्य को सुरक्षित करना है।
हिमालय आज हमें एक स्पष्ट संदेश दे रहा है। बर्फ की चोटियों में होने वाला परिवर्तन दूर की कोई घटना नहीं है। उसका असर आने वाले समय में हमारे खेतों में, हमारे शहरों में और हमारे जल स्रोतों में दिखाई देगा। यदि हिमनद तेजी से पिघलते रहे तो पहले बाढ़ का खतरा बढ़ेगा और बाद में पानी की कमी की समस्या गहरी हो सकती है। इसलिए हिमालय को केवल पर्यटन, धार्मिक आस्था या प्राकृतिक सुंदरता के दृष्टिकोण से देखने का समय समाप्त हो चुका है। उसे एशिया की जीवन-रेखा और जल सुरक्षा की आधारशिला के रूप में देखना होगा। वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेकर अभी से तैयारी करना ही समझदारी है, क्योंकि हिमालय में होने वाले बदलाव को रोकने की कीमत आज जितनी कम होगी, कल उतनी ही अधिक हो सकती है।
— महेन्द्र तिवारी
