कहानी – सृजन धारा
“…हूँ…हूँ …हूँ …हूँ ….देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए… दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए…. ये गिला
Read More“…हूँ…हूँ …हूँ …हूँ ….देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए… दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए…. ये गिला
Read Moreजैसे ही शिखर को पता चला कि चंदा हथिनी के दल का एक बुजुर्ग हाथी तालगाँव के समीप नर्रा जंगल
Read Moreसौतेली माँ के दुर्व्यवहार की पीड़ा झेलती किरण एक शहर में ससुराल आई। सीधा-सादा पति तो मिला; पर सास-ननद की
Read Moreकड़ाके की ठंड पड़ रही थी। साँझ होते ही जंगल के सभी जानवर अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे। ऐसा
Read Moreअपने गुरू महर्षि धौम्य की आज्ञा पाकर आज शाम को आरूणि खेत गया। खेत पहुँचकर देखा कि मेड़ कटी हुई
Read Moreचलो कुछ कर जाएँ, हम पंछी बन जाएँ। नील गगन उड़ते हुए। चींव-चाँव करते हुए।
Read Moreआज मैंने अचानक उसे देख लिया। वह मैली-कुचैली साड़ी में लिपटी थी। अनमनी-सी लगी। पूछ बैठा। ” कौन हो तुम
Read Moreएक शख़्स को देखते ही यशवंत को अपना हाई स्कूल स्टडी लेवल याद गया। मीडिल स्कूल की अपेक्षा हाई स्कूल
Read Moreपिछले फ्राइडे को सांसद का आगमन हुआ। उनका खूब आवभगत हुआ। बड़े खुश होकर लौटे थे सांसद महोदय भी। अंचल
Read Moreहर साल की तरह इस साल भी दशहरा के अवसर पर श्रीरामलीला का मंचन होना था। आसपास के क्षेत्र में
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