सादे से लम्हें..
फिर वो सादे से लम्हें खोजता हूँ |
जिनमें जीवन जीया खुल के वो बाते सोचता हूँ |
बदल गया यूं तो वक्त ,खुद को भी बदल रहा हूँ |
अपने मे अन्तर पहले से कितना देखता हूँ |
खुद को बदलते -बदलते क्या हो गया हूँ |
नहीं पहचान पाता खुद को भी जब आईना देखता हूँ |
फिर वो सादे से लम्हें खोजता हूँ |
जिनमे जीया ……….
यूं तो दिनभर की दिनचर्या मे व्यस्त ही रहता हूँ |
पर मशीन के युग मे फुर्सत के पल तलाशता हूँ |
है ऐहसास भी खत्म ,ज़ज्बात भी खत्म समझता हूँ |
क्यूं खींचती है वो ज़िन्दगी मुझे वापिस वो कशिश देखता हूँ |
फिर वो सादे से लम्हें खोजता हूँ |
जिनमे जीया ………….
कामनी गुप्ता ***