अब चिंता में कब शामिल है
अब चिंता में कब शामिल है
ज़िक्र यहाँ चावल-आटे का
जीवन भर की अर्जित खुशियाँ
मैंने ॠण पर दे दी सारी
समय-समय पर किया तकादा
लेकिन, लौट सकी न उधारी
अंजाने या जान-बूझकर
कारोबार किया घाटे का
उन सांपों से कैसे निपटें
आस्तीन में जो पलते हैं
कहने को अपने हैं लेकिन
पल प्रति-पल चालें चलते हैं
कहांँ भला उपचार मिलेगा
ऐसे सर्पों के काटे का
ऐसी चली समय की आँधी
छिन्न-भिन्न है सब शाखाएँ
निविड़ निशा में प्रश्न यही है
कहाँ रहें और रात बिताएँ
कौन भला प्रत्युत्तर देगा
रजनी के इस सन्नाटे का
— प्रवीण पारीक ‘अंशु’