अंदाज और उसकी बात
न जाने क्या बात थी अंदाज़ में, वो पल उसके साथ में।
कुछ नया सा हो गया, रिश्ता प्यार हो गया।
न जाने रात क्यों महकी , चांद तारों साथ में,
बातों ही बातों में एक रौशनी दिखा गया।
न जाने कैसे था असर निगाह में, उसकी चाह में,
पूरी फिज़ा में जैसे कोई रंग सा समा गया।
न जाने पहले थे कहां गुम मतलबी ज़माने में,
सबसे छीन कर उसे सांसों में समा लिया।
न जाने हर दुआ में क्या हम मांगते थे, रात में,
हर दुआ पर बोलने वो अमीन जैसे आ गया।
न जाने कैसी वीरांगी में ज़िंदगी जी रही थी वो।
हर अंधेरी रात का सवेरा बन कर छा गया।
न जाने कैसे दुःख से दोस्ती किया अकेले में,
छुप छुप के उसे रोता देखने वो आ गया।
— आसिया फारूकी
