कविता

अंदाज और उसकी बात

न जाने क्या बात थी अंदाज़ में, वो पल उसके साथ में।
कुछ नया सा हो गया, रिश्ता प्यार हो गया।

न जाने रात क्यों महकी , चांद तारों साथ में,
बातों ही बातों में एक रौशनी दिखा गया।

न जाने कैसे था असर निगाह में, उसकी चाह में,
पूरी फिज़ा में जैसे कोई रंग सा समा गया।

न जाने पहले थे कहां गुम मतलबी ज़माने में,
सबसे छीन कर उसे सांसों में समा लिया।

न जाने हर दुआ में क्या हम मांगते थे, रात में,
हर दुआ पर बोलने वो अमीन जैसे आ गया।

न जाने कैसी वीरांगी में ज़िंदगी जी रही थी वो।
हर अंधेरी रात का सवेरा बन कर छा गया।

न जाने कैसे दुःख से दोस्ती किया अकेले में,
छुप छुप के उसे रोता देखने वो आ गया।

— आसिया फारूकी

*आसिया फ़ारूक़ी

राज्य पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका, प्रधानाध्यापिका, पी एस अस्ती, फतेहपुर उ.प्र