कहानी

खामोश मुलाकात

क्या विहान, तुम भी हद ही करते हो !
तुमको बोला था न कि आज मंदिर जाना है तो जल्दी तैयार हो जाना। तुमको काम से कभी फुरसत मिलती ही नहीं है। कितना भी बोलते रहो तुम्हें कुछ समझ नहीं आता है।
काम मैं भी करती हूँ पर कम से कम मंदिर के लिए तो टाइम निकाल ही सकते हो न ? इतनी भी क्या व्यस्त होना।
विहान- ओफ्फो! तुम भी न कितना गुस्सा करोगी यार, कभी तो बख्श दिया करो मुझे। हो जाती है देर कभी-कभी। अभी आ गया हूँ न, अब डांटने में ही समय बर्बाद करोगी या चलोगी भी।  वैसे भी हमारे पास वक्त ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता है, उसको भी पंख लग जाते हैं।
प्रज्ञा – हाँ हाँ ठीक है, चलो अब जल्दी। वैसे ही तुमने इतना वक्त लगा दिया आने में।
विहान और प्रज्ञा इंजीनिरिंग कॉलेज में फाइनल ईयर में थे। प्रज्ञा का प्लेसमेंट हो चुका था और वो जोइनिंग डेट का इंतजार कर रही थी। विहान को भी ऑफर लेटर आ चुका था। और वो एक कंपनी में इंटर्नशिप कर रहा था।  दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। प्रज्ञा पढ़ने में काफी इंटेलीजेंट थी उसके नोट्स से न जाने विहान कितने ही सेमेस्टर पास कर चुका था। यूं तो प्रज्ञा पढाई में सबकी ही हेल्प किया करती थी लेकिन विहान से उसको थोड़ी आत्मीयता थी। विहान से मुलाक़ात उसकी कल्चरल क्लब में हुई थी जिसमे विहान क्लब की विभिन्न गतिविधियां जैसे नाटक, ड्रामा और कवि सम्मलेन आदि ऑर्गनाइज़ करवाने वाली टीम में था और प्रज्ञा ने उसमें डांस के लिए पार्टिसिपेट किया था। विहान भी उसकी ही क्लास में था लेकिन कभी प्रज्ञा ने विहान से इतनी बात नहीं की थी ।
कॉलेज में कई बार एक्टिविटीज होती थी और धीरे-धीरे उनकी दोस्ती काफी गहरी हो गयी। जब कभी विहान परेशानी में होता, प्रज्ञा उसकी ढाल बनकर उसके साथ रहती और उसको सपोर्ट करती। प्रज्ञा की एक खासियत थी की रिश्ते चाहें जैसे भी हों दूर के या पास के वो उनको निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी।  वैसे तो प्रज्ञा के कई दोस्त थे पर जो प्रज्ञा को थोड़ा बहुत समझता था वो विहान के अलावा कोई नहीं था। कॉलेज में जाते ही 3rd बेंच प्रज्ञा  और विहान के लिए बुक्ड थी। कोई गलती से भी विहान के साथ बैठ गया प्रज्ञा उसको कहीं और बैठने को बोल देती थी। आगे से उसकी खुद ही हिम्मत नहीं होती थी वहां बैठने की।  विहान भी प्रज्ञा का बहुत सम्मान करता था। उसका सरल-तरल स्वभाव अपने आप में ही मुग्ध करने वाला था। सिचुएशन के अनुसार प्रज्ञा का स्वभाव बहुत सटीक प्रदर्शित होता था। जहाँ विरोध करना है वो डटकर विरोध करती थी और जहां बात शान्ति से सुलझने वाली होती थी प्रज्ञा से बेहतर कोई उस बात को संभाल नहीं सकता था। प्रज्ञा विहान से जितनी भावनात्मक तरीके से जुड़ी हुई थी। साथ ही वो दुनियादारी की बातें और स्थितियां समझने के लिए प्रैक्टिकल भी थी। विहान के साथ रहके उसको अब काफी चीज़ें समझ आने लगी थी। कि दुनिया अच्छी सिर्फ सपनों और कल्पनाओं में होती है। सपने से बाहर की दुनिया उस मरुस्थल में चलते ऊँट की तरह है जिसे वहां की धूप जल से फैला सागर दिखा रही है और पास पहुंच कर वहां रेत के सिवाय कुछ नहीं होता है।
मंदिर मे दर्शन के बाद वे एक जगह बैठ गए और बातों का कुछ सिलसिला चला।
प्रज्ञा बोली- तो अब तुम मुंबई चले जाओगे अगले महीने ? कुछ और ही दिन है अपने पास।
विहान- हाँ वो तो है।  मुझे घर के भी बहुत काम निबटाने हैं अभी।  छोटी बहन का एडमिशन होना है कॉलेज में और पापा का भी दूकान का काम देखना है थोड़ा। सब कुछ इतनी जल्दी हो रहा है पता नहीं सब कैसे मैनेज करूँगा।
प्रज्ञा (अपनी उदासी छुपाते हुए धीमे आवाज़ में बोली )-  हाँ ! बदल तो बहुत कुछ रहा है।
फिर हवा की एक तेज लहर चली और सन्नाटे में तब्दील हो गयी।
प्रज्ञा – वैसे विहान, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे न ?
विहान(हँसते हुए बोला)- मैं क्यों भूलूंगा, और तू आज ये कैसी बातें कर रही है। किसी बात से परेशान है क्या ?
प्रज्ञा – तुमने ये भी समझ लिया कि मैं परेशान हूँ।
विहान- हाँ इतना तो जानता हूँ मैं, इतने साल हो गए तुझे देखते-देखते। बता अब बात क्या है ? मैं मंदिर के लिए लेट हो गया इसलिए नाराज है क्या ?
प्रज्ञा – नहीं यार, वो बात नहीं है। तू जा रहा है तो अच्छा नहीं लग रहा।
विहान- तेरी भी तो जोइनिंग आने ही वाली है। बस अब अच्छे दिन आ गए। आखिरकार कॉलेज से पीछा छूटा और अब असली जिंदगी शुरू होगी। साथ में एक डर भी है! खैर सब कुछ अच्छे से हो जाए अब।
जो सपने थे अपने अब जाकर उनको पूरा करने का मौक़ा मिल रहा है। मैं तो बहुत खुश हूँ और काफी एक्साइटेड भी। यही तो चाहिए था मुझे। आखिर मेरी मेहनत रंग लायी। और अच्छी जगह जॉब लग गयी।
प्रज्ञा – हाँ, ये तो है। नयी जगह होगी, नए लोग होंगे।  ये सफर होगा तो अलग और एक्साइटेड।  लेकिन न जाने क्यों मुझे लग रहा है बहुत कुछ ख़तम भी हो रहा है। तू भी चले जायेगा अब।
विहान- क्यों सोच रही है इतना तू ? सोचना काम कर दे अब। बच्ची नहीं रही अब तू। और मैं चला जाऊंगा का क्या मतलब है ? कॉन्टैक्ट में रहेंगे ही अपन। अपने बारे में सोच अब। कि तुझे क्या करना है आगे कैसे सारी चीज़ें संभालनी है। और मैं हूँ तो, कहाँ जा रहा हूँ मैं जो ऐसा बोल रही है।
प्रज्ञा  – हाँ सही कहा तुमने
कुछ देर शांत रहके प्रज्ञा बोली – ठीक है विहान अब मैं चलती हूँ। मेरे जाने का समय हो गया है।
विहान ने भी बोला – हाँ ठीक है , मैं तुझे घर तक छोड़ देता हूँ।
प्रज्ञा बोली- रहने दो, कुछ दिन बाद तो मुझे अकेले ही जाना है वैसे भी। कुछ आदतें अब बदलनी पड़ेंगी मुझे क्योंकि तुम कहाँ कहीं जा रहे हो ?
बाय बोलके प्रज्ञा भारी मन से वहां से निकल गयी।
विहान अब तक स्तब्ध सा खड़ा रहा कि आखिर सच में वो जा ही तो रहा है प्रज्ञा से बहुत दूर। उसकी आदतों से दूर, उसके साथ से दूर एक अलग दुनिया में, जहाँ उसे शायद प्रज्ञा  जैसे अच्छे लोग न मिले। कैसे रहेगा दोगले लोगों के बीच वो। आखिर उसे वहां कोई मिलेगा भी कि जिसपर वो भरोसा कर सके। नहीं मिलेगा। वो खुद कौनसा इतना अच्छा है।  ये तो प्रज्ञा का बड़प्पन है जो वो उसकी कितनी ही बेकार बातें और बुरी आदतें झेलती है। प्रज्ञा  ही तो है जो उसको देखते ही समझ लेती है कि उसके मन में क्या चल रहा है। उसका अस्तित्व प्रज्ञा से है। प्रज्ञा ही तो प्रेरणा है उसकी जिसके पवित्र निस्वार्थ भाव और विश्वास का परिणाम है कि आज वो यहाँ तक पहुंचा है। हाँ वो बहुत दूर जा रहा था। प्रज्ञा से दूर………खुद से दूर !!!!
— सौम्या अग्रवाल

सौम्या अग्रवाल

पता - सदर बाजार गंज, अम्बाह, मुरैना (म.प्र.) प्रकाशित पुस्तक - "प्रीत सुहानी" ईमेल - [email protected]