ग़ज़ल
कांटों का कोई दोष नहीं चलने वाले को होश नहीं
जख्म किसी को मैं दे दूं मेरी इतनी छोटी सोच नहीं
तुमने ही तो तोड़ा और फेंका है पगडंडी पर
अब चुभ भी जाऊं तो होता कोई अफसोस नहीं।
हर शबनम गुल के हिस्से में मैं कैसे ले जा नर्म करूं
गुल मेरी हिफाजत में है पर मेरे हिस्से में ओस नहीं।
गर दुआ ना देना मुझको बद्दुआ में शामिल मत करना
चुभना तो मेरी फितरत है चुभने का मुझको शौक नहीं।
देखो या अनदेखा कर दो मैं भी डाली का हिस्सा हूं
मेरा वजूद भी है मैं केवल डाली पर बोझ नहीं।
पतझड़ जलती धूप या सावन रिमझिम हो जानिब
हर मौसम साथ गुजारा है मौसम का कोई खौफ नहीं।
— पावनी जानिब