कविता

केसरिया सी निखरती मैं

केसरिया सी निखरती मैं

झांझर सी छनकती मैं

चूड़ी सी खनकती मैं

झरने सी बहती मैं

आखिर क्यों?

दुनिया पतझड़ सह रही और 

पहली बारिश में भीगती मैं

दुनिया जिससे जल रही

उस सूरज सी चमकती मैं

चांदनी रात में

चकोर सी मचलती मैं

जुगनू से सजी हुई 

शमा सी जलती मैं

तुम्हारे प्यार की रोशनी में

केसरिया सी निखरती मैं

— सौम्या अग्रवाल

सौम्या अग्रवाल

अम्बाह, मुरैना (म.प्र.)

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