कुण्डली/छंद

छप्पय छंद

मिथ्या की अभिव्यक्ति, सुहानी लगती हरपल।
निश्छलता की भक्ति, लगे सबको हर पल छल।
सत्य वचन की राह, चले तो आई अड़चन।
झूठी मन में चाह, पले तो सब खुश मन मन।
जब झूठ सत्य जैसा लगे, सत्य लगे बेकार है।
तब समझो कलयुग आ गया, तम मय यह संसार है।

अवधपुरी में राम, लला का अभिनन्दन है।
बाम सिया के साथ, करूॅं प्रभु का वंदन है।
मेरे हिय में नाम, बसा वह रघुनंदन है।
जिस मन में श्री राम, बसे वह निर्मल मन है।
रघुनंदन मेरे साथ हैं, तब तक घट में जान है।
यह उज्वल तन बिन राम के, सूखे वृक्ष समान है।

बजरंगी श्री राम, नाम का सुमिरन करते।
धाम राम रज चरण, सदा ही सिर पर धरते।
हनुमत जैसा भक्त, नहीं कलयुग में दूजा।
की निस्वार्थ सशक्त , सदा स्वामी की पूजा।
श्री राम भक्त के चित्र को, मित्र भले मत पूजिए।
पर प्रभु बजरंग चरित्र को, हिय में धारण कीजिए।

लगती बड़ी अटूट, सांस से डोरी तन की।
किस पल जाए टूट, पुण्य गाथाजीवन की।
कष्ट रहें भरपूर, रहे जब तक यह जीवन।
होंगे सब दुख दूर, बंद जब होगी धड़कन।
यह जीवन गठरी मोह की, क्यों सिर रखकर ढोय है।
दुखियारे जगत बिछोह की, वजह मोह ही होय है।

प्रदीप शर्मा

आगरा, उत्तर प्रदेश

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