कविता

कविता – नारी

कुछ उम्मीदों को लेकर नारी आती,
पीहर से विदा होकर जब सुसराल आती,
सबको खुश रखना यह बात बतायी जाती,
सबको सम्मान देना,यह बात याद आती,

घुल जाती गृहस्थी में जब नारी,
सब सपने अपने भूलने लगती,
शौक उसके सभी रह जाते अधूरे,
अपनी ही गृहस्थ जीवन में रमती,

सबकी फरमाइश पूरी करते करते,
अपनी पसंद को दरकिनार करती,
घर का कार्य निरतंर चलता फुर्सत नहीं मिलती,
समय कार्य से करने में भाग दौड़ करती,

नारी घर का वो स्तम्भ मजबूत खम्बा होता,
फिर भी गृहणी का कोई मोल नहीं होता,
जब वो सोचती मेरी कोई तारीफ होती,
लेकिन हर बार यह सुनने में नाकाम होती,

बन्धन,मर्यादा,पाबंदी सब उस पर लागू होती,
गलती न होने पर गलती मनाने को मजबूर होती,
घर के कामों से अपने लिए फुर्सत न होती,
फिर भी नारी हमेशा मुस्कराती होती.

— पूनम गुप्ता

पूनम गुप्ता

मेरी तीन कविताये बुक में प्रकाशित हो चुकी है भोपाल मध्यप्रदेश

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