मुझको निपट स्वारथी बनना
खुद को सुखी बनाने के हित, सबका सुख है सृजित करना।
नहीं करना है मुझे परमारथ, मुझको निपट स्वारथी बनना।।
असंतुष्ट जब आस-पास हों।
फसल में, जब घास-पात हों।
कैसे सुखी में रह पाऊँगा?
अपने साथी जब उदास हों।
खुद ही कमाकर खाना है मुझे, नहीं किसी का धन है हरना।
नहीं करना है मुझे परमारथ, मुझको निपट स्वारथी बनना।।
पूजा नहीं किसी की करता।
नहीं किसी का चैन मैं हरता।
प्रकृति का कण-कण शंकर है,
स्वारथी हूँ, सबमें मैं रमता।
स्वच्छ जल और वायु चाहिए, स्वार्थी हूँ, संरक्षण करना।
नहीं करना है मुझे परमारथ, मुझको निपट स्वारथी बनना।।
भ्रष्ट आचरण ना सुख देता।
लोभ-लालच है, नींद हर लेता।
सदाचार से सुख का सृजन,
कलयुग हो या फिर हो त्रेता।
चतुर और चालाक नहीं मैं, सीधे पथ चल कंटक चुनना।
नहीं करना है मुझे परमारथ, मुझको निपट स्वारथी बनना।।
अन्याय किसी का नहीं है सहना।
हर पल, मुझे, कर्मरत रहना।
पल-पल हो आनन्द का सृजन,
नहीं चाहिए, कोई गहना।
असंतुष्टों से घिर कर प्यारे! नहीं मुझे असंतुष्ट है रहना।
नहीं करना है मुझे परमारथ, मुझको निपट स्वारथी बनना।।