अपना घर
बना कबाड़ा क्यों अपना घर।
हम सब बैठे चुप,बिस्तर पर।
कहीं पड़ी कागज की रद्दी,
टूटी कुर्सी, गायब गद्दी,
कोने में रो रहे खिलौने,
गुड़िया, गुड्डा, हाथी, बौने,
क्यों न साथ अब खेलें बच्चे
कब से दुखी रो रहा बंदर।
कम्प्यूटर है बड़ा पुराना,
हुए खरीदे एक जमाना,
प्लग, डिब्बे, बिजली के तार
लगा है कपड़ों का भंडार,
जाने कितना लोहा – लंगड़
जहाँ सर्प – बिच्छू का है डर।
मात – पिता को हम समझाएँ,
व्यर्थ की चीजें सभी हटाएँ,
भलीभांति हो साफ – सफाई,
हो कबाड़ की तुरत विदाई,
सुव्यवस्थित जब दिखेगा सब कुछ
अच्छे लगेगा घर के अंदर।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र