कविता

तेरा प्रभाव

मेरा ये भाव
है तेरा प्रभाव,
बिन तेरे जैसे
लागे आभाव।

कैसा लगाव,
कितना जुड़ाव,
थके पथिक को
मिले शीतल छाँव।

कभी ऐसा लगे
जैसे गये थे ठगे
जो तुम मिले
लगते सगे।

अविरल बहे
कितना सहे
जैसे नदी
चुप ही रहे।

कैसी ये डोर
खींचे तेरी ओर
थाम तो लो
ये दूजी छोर।

भिगो कर मन
खिलाया सुमन
सुभासित करो
मेरा उपवन।

मेरे आँगन
पहन कंगन
खनकाओ तुम
ये जीवन।

होता प्रतीत,
बन गये मनमीत,
हृदय के द्वार
नाम तेरा अंकित।

— सविता सिंह मीरा

सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - [email protected]

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