कुण्डली/छंद

लावणी छंद मुक्तक 

पुण्य कर्म जब उदयित होते, जीवन निज सार्थक होता,

मानवता ही धर्म मनुज का, सहज मिटे भव-भव गोता,

पूजन, वंदन, अर्चन कर लो, परमेश्वर तारणहारे,

परमात्मा की कृपा दृष्टि हैं, क्यों चिंता में मन खोता।। 

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८

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