लावणी छंद मुक्तक
पुण्य कर्म जब उदयित होते, जीवन निज सार्थक होता,
मानवता ही धर्म मनुज का, सहज मिटे भव-भव गोता,
पूजन, वंदन, अर्चन कर लो, परमेश्वर तारणहारे,
परमात्मा की कृपा दृष्टि हैं, क्यों चिंता में मन खोता।।
पुण्य कर्म जब उदयित होते, जीवन निज सार्थक होता,
मानवता ही धर्म मनुज का, सहज मिटे भव-भव गोता,
पूजन, वंदन, अर्चन कर लो, परमेश्वर तारणहारे,
परमात्मा की कृपा दृष्टि हैं, क्यों चिंता में मन खोता।।