गीतिका/ग़ज़ल

हररोज यहाँ कोई नीलाम हो रहा

ईश्क में कत्ल अब आम हो रहा
हर रोज यहाँ कोई बदनाम हो रहा

आसमान तक पतंग डोर संग गयी
शाम की कहानी सिर्फ भोर संग गयी
टूटती और कटती यहाँ डोर सभी की-
हर रोज यहाँ कोई गुमनाम हो रहा

दिललगी में सियासी चलन छा गया
जिसका भाव जैसा वैसा मोल पा गया
हैं दोनों तरफ से सिर्फ फरेबी निगाहें –
हर रोज यहाँ कोई नीलाम हो रहा

रूहानी अब यहाँ रिस्ते नहीं रहे
लैलामंजनू के यहाँ किस्से नहीं रहे
अब तो सौदा! जज्बातों का होता है
हर रोज यहाँ कोई संग्राम हो रहा

एतबार क्यों अब मुकम्मल नही है
वफा क्यों अब मुसलसल नही है
बेराज यहाँ जो थे बा(राज) हो गये
हर रोज यहाँ खेल तमाम हो रहा

राज कुमार तिवारी (राज)
बाराबंकी उ0प्र0

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782

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