हररोज यहाँ कोई नीलाम हो रहा
ईश्क में कत्ल अब आम हो रहा
हर रोज यहाँ कोई बदनाम हो रहा
आसमान तक पतंग डोर संग गयी
शाम की कहानी सिर्फ भोर संग गयी
टूटती और कटती यहाँ डोर सभी की-
हर रोज यहाँ कोई गुमनाम हो रहा
दिललगी में सियासी चलन छा गया
जिसका भाव जैसा वैसा मोल पा गया
हैं दोनों तरफ से सिर्फ फरेबी निगाहें –
हर रोज यहाँ कोई नीलाम हो रहा
रूहानी अब यहाँ रिस्ते नहीं रहे
लैलामंजनू के यहाँ किस्से नहीं रहे
अब तो सौदा! जज्बातों का होता है
हर रोज यहाँ कोई संग्राम हो रहा
एतबार क्यों अब मुकम्मल नही है
वफा क्यों अब मुसलसल नही है
बेराज यहाँ जो थे बा(राज) हो गये
हर रोज यहाँ खेल तमाम हो रहा
राज कुमार तिवारी (राज)
बाराबंकी उ0प्र0