गीतिका/ग़ज़ल

गजल

तलाश खुद की खुदी के असीम सागर में
किसी की प्यास भटकती हो जैसे गागर में

अगर जो फर्क है आदम में और पयम्बर में
जरूर फर्क है फिर राम में और बाबर में

कहां तो दिन का उजाला कहां अंधेरी रात
कहीं तो फर्क है कतरे में और समन्दर में

अब और कहां तक बढें कहां तलक फैलें
हमारे पांव तो दक्खिन में शीश उत्तर में

है एक रामचरित-मानस दूसरा हंस
राम तुलसी में ‘शांत’वे ही नागर में

— देवकी नंदन ‘शांत’

देवकी नंदन 'शान्त'

अवकाश प्राप्त मुख्य अभियंता, बिजली बोर्ड, उत्तर प्रदेश. प्रकाशित कृतियाँ - तलाश (ग़ज़ल संग्रह), तलाश जारी है (ग़ज़ल संग्रह). निवासी- लखनऊ

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