चैत्र मास और जीवन शैली में परिवर्तन
चैत्र महीना प्रकृति के लिएअनुपम उपहार है। छह ऋतुओं में बसंत ऋतु की महक इसी मास में सबसे अधिक होती है। इसलिए प्रकृति भी खिली-खिली व चहकती दिखाई पड़ती है। तरु नूतन पल्लव सेअच्छादित हो जाते हैं। टहनियाँ नई कोंपलो और कुसुमों से भर जाती हैं | बागों में कोयल का गान मुंडेरो पर गौरैया की फुदकन चारों तरफ हरियाली की छटा व पक्षियों की चहकन भ्रमरों का गुंजन मन को लुभाता है |
चैत्र मास के मध्य में प्रकृति अपने शृंगार व सृजन की प्रक्रिया में होती है। आसपास बिखरे रंग-बिरंगे फूल, पेड़ों पर नई कोंपलें देख ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण सृष्टि नवीन हो गई है |
इसी महीने से भारतीय नववर्ष आरम्भ होता है | वर्ष का प्रथम मास होने के कारण इसका महत्त्व बढ़ जाता है। इस दिन चित्रा नक्षत्र में पूर्णिमा पड़ने के कारण इस महीने का नाम चैत्र पड़ा।
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने चैत्र मास की प्रतिपदा को सृष्टि की रचना की और यहीं से सतयुग का प्रारम्भ हुआ |
माना जाता है की चैत्र महीने की प्रतिपदा को भगवान विष्णु के दशावतारों में प्रथम अवतार “मतस्यावतार” हुआ |
चैत्र महीने से शीत ऋतु की पूरी तरह विदाई हो जाती है और ग्रीष्म अपनी प्रचंडता को धीरे धीरे बढ़ाने लगता है,इस वजह से चैत्र माह से खान-पान और जीवन शैली में कुछ ऐसे बदलाव करने भय जरुरी हैं , जिनसे ऋतु परिवर्तन के समय होने वाली मौसमी बीमारियों से सभी बच सके। इन दिनों प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठ जाना चाहिए, व्यायाम और योग को अपनाकर दिनचर्या प्रारम्भ करनी चाहिए |
इस माह में हल्का, ताज़ा, और आसानी से पचने वाला भोजन करना चाहिए |
चना रक्त संचार को बेहतर करता है और कई बीमारियों से बचाता है. इस लिए चना खाना चाहिए
नीम शीतल होता है और यह रोग प्रतिरोधक होता है इसलिए इसका भी उपयोग नियमित करना चाहिए
दूध मिश्री या शहद के साथ पीना चाहिए फल,सांमा चावल,खीरा मौसमी फल का अधिक सेवन करना चाहिए |
मांसाहार, मदिरा,गुड़,खट्टी चीजें,तेज मसालेदार खाना वा
बासी भोजन नहीं करना चाहिए |
जीवन एक बार मिलता है अतः स्वास्थ्य का ध्यान रख कर हमें उत्तम जीवन जीने का मूल मंत्र लेना ही चाहिए | यही सुख की अनुभूति का मार्ग भी है |
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
