संस्मरण

मेरी कहानी 160

सुबह उठे तो मज़े से हम चाय के साथ बिस्कुट ले कर बातें करने लगे और आज के प्लैन का सोचने लगे। अलगाव की टूरिस्ट गाइड बुक तो हमारे पास ही थी जो हम ने इंगलैंड में ही खरीद ली थी। हमारे दिमाग में तो बहुत कुछ देखने को था लेकिन यहां आ कर पता चला कि एक हफ्ते में यह सब मुश्किल था। आज हम ने सिर्फ अलगाव एरिये को जानने के लिए घूमने का प्रोग्राम बनाया। नक्शा देखने में जसवंत बहुत एक्सपर्ट है। एक रैस्टोरैंट में ब्रेकफास्ट ले कर हम ने पहले एक बहुत बड़ी ओपन मार्किट देखने का मन बनाया, इस मार्किट का नाम भूल गया है। पुर्तगाली भाषा में हर नाम हमें अजीब लगता था और इन को याद रखना भी आसान नहीं था। गाड़ी में पैट्रोल बहुत कम था, इस लिए पहले एक पैट्रोल स्टेशन से टैंक भरवा लिया। याद आया इस ओपन मार्किट का नाम शायद साओ झाओ था। एक जगह भूले और फिर पूछते पूछते हम मार्किट के नज़दीक पहुँच गए। कार पार्क में गाड़ी खड़ी की और मार्किट में दाखल हो गए। यह मार्किट ऐसे ही थी जैसे इंगलैंड में स्टाल लगे होते हैं जिन को हम पंजाबी लोग फट्टे लगाना कहते हैं। टैंट जैसे यह स्टाल काफी बड़े थे और कपडे, लैदर के कोट, फैंसी गुड्स यानी घर में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ थी, सिर्फ फर्क इतना था कि पुर्तगाली मठाईआं और नमकीन कुछ इलग्ग थे जो हम ने पहले कहीं नहीं देखे थे। बहुत पुर्तगाली इंग्लिश नहीं बोलते थे लेकिन हम उन्हें इशारों से समझा देते थे। जैसे इंडिया में मेले में जलेबीआं पकौड़े आदिक बनाते हैं, इसी तरह इस मार्किट में एक बहुत बड़ीआ मठाई बनाते थे, यह ऐसे ही थी जैसे इंगलैंड में डोनट बनाते हैं। क्योंकि अलगारव एक टूरिस्ट स्पॉट है, इस लिए हर दुकानदार जानता है कि ग्राहक को कैसे सर्व करना है। हम ने आर्डर दिया और उस पुर्तगाली ने कुछ ही मिनटों में प्लेटें भर कर हम को दे दीं। खड़े हो कर ही हम खाने लगे और हर कोई बोल रहा था कि मज़ा ही आ रहा था।
जो हम ने खाया, नाम तो हमें पता नहीं था और खा कर हम आगे बड़े। इस मार्किट में जिप्सी लोगों के स्टाल बहुत थे। यह जिप्सी लोग ऐसे होते हैं जैसे हमारे देश में खानाबदोश लोग,जिन के पास बैल गाड़ीआं होती हैं और जगह जगह घूम कर अपनी उपजीविका कमाते हैं। इन की सत्रीओं का पहरावा ऐसा होता है जैसे राजस्थानी औरतें घागरा पहनती हैं। जैसे इंगलैंड और अन्य देशों में हर देश के शहरी रहते हैं, इसी तरह पुर्तगाल में भी हैं और ख़ास कर उन देशों के लोग जिन पर पुर्तगीजों का राज था। ब्राज़ील भी कभी पुर्तगाल के अधीन था, इसलिए यह लोग ब्राज़ीलियन जैसे दिखाई देते थे और इन का रंग और शक्ल कुछ कुछ ऑस्ट्रेलियन इंडियन जैसा था। यहां भी ऐसा ही था कि कोई स्टाल वाला कीमत बताता तो हम कहते कि हम कम पैसे देंगे और आखिर में वोह कीमत बहुत कम कर देते। यह ब्राज़ीलियन औरतों का हमें जल्दी ही पता चल गया कि वोह बहुत हुशिआर थीं। हम ने टेबल क्लाथ लेने थे जो जगह जगह ऐसी औरतें बेच रही थीं। इन की कीमत का हमें कुछ कुछ आइडिया हो गया था। अक्सर वोह बारह या तेरह यूरो मांगती थीं और आखिर में सात आठ यूरो में बेच देती थीं। इस मार्किट में हम ने काफी कुछ खरीदा। आसमान में घने बादल आ गए थे और फिर एक दम बारिश शुरू हो गई। भागते भागते हम एक टैंट के नीचे आ कर खड़े हो गये जो एक इंडियन का था जो सारी मार्किट में एक ही था और उन की भाषा से जो वोह आपस में बोल रहे थे, बंगाली लगते थे लेकिन हिंदी भी बोलते थे। मैंने उन से पुछा की वोह अलगाव में ही रहते थे या कहीं और तो उस ने बताया कि वोह लिज़बन से आये थे। हम हैरान हुए कि वोह तीन घण्टे ड्राइव करके आये थे और इतने ही घण्टे वापस जाने में खर्च हो जाने थे। हमारे भारतीयों की मिहनत को सलाम !, बारिश हो रही थी और ग्राहक भी कम हो गए थे।
इन लोगों के साथ हम बातें भी कर रहे थे लेकिन उन के साथ एक औरत भी थी जो हिंदी नहीं बोलती थी। उस औरत ने टैंट के नीचे ही एक गैस का सटोव जलाया और एक फ्राई पैन में कुछ तेल डाल कर मछलियां भूननी शुरू कर दीं और एक तरफ एक बर्नर पर फ्राई पैन में पियाज़ और टमाटर और कुछ तेल डाल कर उन को भूनना शुरू कर दिया। पुर्तगाल में अलगाव तो मछलियों का घर है। यहां इतने प्रकार की मछलियां होती है कि जगह जगह सीआईड पर खुले में मछलियां भूनने के बर्बरकीउऊ स्टाल लगे हुए हैं। उस औरत ने कुछ ही मिनटों में मछलियां तैयार कर लीं और वोह लोग खाने लगे। बारिश भी कम हो गई थी और हम वहां से चल पड़े। यह मार्किट इतनी बड़ी थी कि घुमते घुमते हम थक गए थे और कार पार्क में आ कर कार में बैठ गए। कुछ देर बैठे बातें करते रहे और फिर हम मंचीक देखने चल पड़े। मंचीक (monchique ), पहाडियों में एक छोटे से गाँव जैसा है और यहां प्राचीन चर्च हैं। यह सफर बहुत मज़ेदार था। छोटी छोटी पहाड़ीयां, कभी ऊपर जाते, कभी ढलान शुरू हो जाती। एक तरफ चटान और दुसरी तरफ घने जंगल जैसे सीन बहुत सुन्दर लगते थे। सड़कें बहुत अछि और सफाई बहुत थी। जैसे इंडिया में रास्ते में छोटी छोटी दुकाने होती हैं, इसी तरह यहां भी थीं। एक जगह दूर से ही कोका कोला का बोर्ड दिखाई दिया और हम ने गाड़ी खड़ी कर ली। दुकानदार इंग्लिश नहीं बोलता था लेकिन समझ गया और एक एक बोतल कोका कोला की ली और साथ में चीज़ सैंडविच लिए। खा और पी कर सतुंष्टि हो गई और आगे चल पड़े। यह पहाड़ी सफर ख़तम होने पर आगे का सीन बिलकुल इंगलैंड के कंट्रीसाइड जैसा था। आगे सड़कें कुछ तंग लेकिन बहुत अछि थीं। रास्ते पर साइन बोर्ड लगे हुए थे जो गाँवों की दिशा दर्शा रहे थे। सफाई और हरियाली मनमोहक थी। मंचीक की साइन देखते देखते हम नज़दीक आ गए। पहले हम को टॉयलेट का साइन दिखाई दिया और हम उस तरफ चल दिए। बहुत सी टॉयलेट इस छोटी सी बिल्डिंग में थीं लेकिन सफाई भी काबलेतारीफ थी। हम इन गाँवों का भारत के गाँवों से मुकाबला करके हंस रहे थे।
मंचीक गाँव के सेंटर में हम आ गए, कोई भीड़ भाड़ नहीं थी, एक तरफ छोटा सा बस स्टेशन था जिस में बस में बैठने वालों की लाइन लगी हुई थी। एक तरफ यात्रियों के लिए टॉयलेट थीं जो काफी बड़ी बिल्डिंग में थीं और सफाई के लिए एक पुर्तगाली कुर्सी पर बैठा था। हम इधर उधर घूमने लगे और इस गाँव के सीन देखने लगे। एक तरफ हमारे गाँवों की तरह एक रेप्लिका कूंआं (नकली सा ) बना हुआ था और खेतों में पानी देने के लिये जैसे टिंडों (बर्तन जैसे ) की चेन बनी हुई थी। यह बहुत खूबसूरती से बना हुआ था। हम ने इस की फोटो लीं। मुसीबत यह थी कि यहां कोई इंग्लिश नहीं बोलता था और हमें इशारों से समझाना पड़ता था लेकिन लोग बहुत अच्छे थे। अब हम नक्शे पर दर्शाये चर्च को देखने चल पड़े। चर्च देखने का हमारा मकसद पुराना आर्ट देखना ही था। गाँव देख कर बहुत अच्छा लगा। शान्ति तो भारत के गाँवों की तरह ही थी लेकिन सफाई और गली में लगा ईंटों का फर्श बहुत अच्छा लग रहा था। गन्दगी का नामोनिशान नहीं था। बीच बीच छोटी छोटी दुकाने थीं लेकिन सब में सफाई बहुत थी। एक गली में एक बुडीया बैठी थी जो एक टोकरे में सब्ज़ियां ले कर बैठी थी और लोग उन से सब्ज़ियां खरीद रहे थे। हम आगे जा रहे थे और चर्च का नाम लेते तो लोग इशारा कर देते। जब हम चर्च के सामने आये तो बाहर से तो साधारण ही लगता था लेकिन भीतर जा कर मज़ा ही आ गया। हर तरफ आर्ट ही आर्ट दिखाई दे रहा था जो लिखा नहीं जा सकता। कोई आधा घंटा हम चर्च में रहे और चर्च के पादरी ने जो इंग्लिश बोलता था बहुत कुछ बताया, इस का इतिहास और बादशाहों के नाम जो हम को याद रह ही नहीं सकते क्योंकि हम को यह अजीब लगते थे।
कुछ देर और इस गाँव में रहे, एक कैफे में चाय पी और वापिस चल पड़े। एक बात हम ने नोटिस की कि जैसे इंगलैंड के गाँवों में गोरे लोग,काले लोगों को अजीब नज़रों से देखते हैं, इस तरह यहां कुछ नहीं था। बस ऐसे घूम रहे थे जैसे हम भारत के किसी गाँव में घूम रहे हों, भाषा ना समझते हुए भी सब कुछ समझ रहे हों। मोनच्चीक की यात्रा एक sight seeing ही थी लेकिन बहुत अछि लगी। अब हम वापिस चल पड़े। अलगाव टाऊन में दाखल हो कर एक जगह हम ने गाड़ी पार्क की और घूमने लगे। जैसे इंडिया में सड़कों पर टी स्टाल या ढाबे होते हैं, इसी तरह यहां जगह जगह बियर बार थीं, यहां खाने के लिए भी बहुत कुछ उपलब्ध था। ऐसी ही एक बार पर हम आ कर ठहर गए। एक गोरा गोरी जो पैंशनर थे बड़ी सी छतरी के नीचे बैठे सड़क के नज़दीक ही, वहां बैठे ठंडी ठंडी बियर का आनंद ले रहे थे। बातें करके पता चला कि वोह भी इंग्लैंड से ही थे। जब हम ने बताया कि हम भी इंगलैंड से आये थे तो वोह दोनों खुश हो गए और बुड़ीआ नें हमें बीअर का पुछा कि हम किया पसंद करेंगे। कुलवंत और गियानो बहन ने पाइन ऐपल जुइस ले लिया और हम ने एक एक बियर ले ली। बातें करने लगे और पता चला कि बूढ़ा बूढ़ी 19सवीं दफा यहां आये थे। जब हम ने पुछा कि ऐसा क्यों, तो उन्होंने बताया कि एक तो यहां के लोग बहुत फ्रैंडली थे और दूसरे मौसम बहुत अच्छा होने के कारण उन की सिहत यहां बहुत अछि रहती थी और तीसरे इंग्लैंड से यहां बहुत सस्ता था । बातों बातों में पता चला कि यह लोग हम से कितने इलग्ग थे। ना इन को कोई बेटे बेटी का फ़िक्र था और ना किसी रिश्तेदारी का, बस अपनी पैंशन का मज़ा ले रहे थे। बहुत बातों का तो हम को पता ही था लेकिन उन की ज़ुबान से सुनने पर पक्का यकीन हो गया कि हम लोग तो रिश्तों की मुसीबतों से जूझते जूझते ज़िन्दगी बिता देते हैं, ना इन को कोई बेटी की चिंता, ना उन की शादी की चिंता और सब से बड़ी बात दान दहेज़ की बातों को यह लोग जानते ही नहीं कि यह किया होता है। ज़्यादा से ज़्यादा बेटी और दामाद को फूलों का गुलदस्ता और कोई छोटा मोटा गिफ्ट जो जरूरी नहीं कि महंगा हो और आगे वोह हंस कर ले लेते हैं और थैंक्स कह देते हैं।
काफी देर तक हम उस बज़ुर्ग कपल से बातें करते रहे और फिर उन से विदा ली और आगे चल पड़े। धुप बहुत सुहानी लग रही थी और यह मौसम इंडिया जैसा लगता था। आगे गए तो एक छोटा सा शॉपिंग काम्प्लैक्स था और दुकाने तो इतनी बड़ी नहीं थीं, लगता था जैसे जालंधर में ही घूम रहे हों, सिर्फ एक ही फर्क था कि सफाई बहुत थी। एक ओर कुछ खुली जगह थी और कुछ बैंच पड़े थे और साथ ही फूलों के लिए जगह बनी हुई थी और कुछ प्लांट लगे हुए थे। यहां आ कर कुछ देर के लिए बैठ गए। बातें करते करते कुछ समय बीत गया और हम उठ कर होटल में जाने के लिए तैयार हो गए क्योंकि अब हम थक से गए थे। दुकानों को देखते और विंडो शॉपिंग करते करते कार में बैठ गए और जल्दी ही होटल में पहुँच गए। कुछ घंटे अपने अपने कमरे में सोते रहे, शाम हो गई थी। तैयार हो कर हम ने कमरे बन्द किये और बाहर आ गए। रात का खाना फिर एक ग्रीक रैस्टोरैंट में खाने का सोच लिया था। इस एरिए की हम को अब काफी वाकफियत हो गई थी, वैसे तो हर देश से हॉलिडे के लिए लोग आये हुए थे लेकिन अँगरेज़ बहुत थे, इस लिए हम को कुछ महसूस नहीं होता था। इंगलैंड में अंग्रेजों का रवईया चाहे कितना भी इलग्ग हो लेकिन बाहर आ कर ऐसे था जैसे हम देश वासी ही हों। हर तरफ चहल पहल थी लेकिन इतना रश नहीं था, कुछ रैस्टोरैंट आधे भरे हुए थे और कुछ में तो बीस पचीस लोग ही होते थे। यही वजह थी कि होटलों के बाहर लोग खड़े होते थे और हमें उन के होटल में आने के लिए सवागत कर रहे थे।
एक ग्रीक होटल में हम चले गए और हमें हैरानी हुई कि यहां भी पांच छै लोग ही बैठे थे। कुलवंत और गियानो बहन का तो मुझे याद नहीं कि किया आर्डर दिया था लेकिन हम दोनों ने ग्रीक करी चिकन और चावल का आर्डर दिया और हम ने यह आर्डर दे कर कोई गलती नहीं की क्योंकि यह बहुत ही स्वादिष्ट था। एक चालीस बतालीस का नौजवान हमारे पास ही आ कर बैठ गया, पता नहीं वोह इस होटल का मालक होगा या नौकर लेकिन वोह इंग्लिश में बात कर रहा था। हम से काफी देर बातें करता रहा जो अब याद नहीं लेकिन वोह हर टेबल पर जा कर ग्राहकों के साथ बातें कर रहा था। अब हम ने कहीं और तो जाना नहीं था, इस लिए बहुत देर तक बैठे बातें करते रहे। बाद में एक एक काफी का कप्प पी कर हम अपने कमरे में वापिस आ गए। क्योंकि सुबह को हम ने लिस्बन जाना था और कोच सुबह पांच बजे चलनी थी, इस लिए हम जल्दी ही सो गए। चलता. . . . . . . . .

9 thoughts on “मेरी कहानी 160

  • Man Mohan Kumar Arya

    नमस्ते। आज की किश्त अच्छी लगी। आप भाग्यशाली हैं कि आपको सृष्टि को दूर दूर तक देखने का अवसर मिला है। वेदों में भी एक मंत्र में कहा गया है कि मनुष्यों को ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि को देखना चाहिए जो न कभी पुरानी होती है और न मरती है। एक नई जगह की जानकारी देने के लिए हार्दिक धन्यवाद् आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। सादर।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      धन्यवाद मनमोहन भाई ,बस अचानक ही प्रोग्राम बना और चल पड़े .आज मैं चाहूँ तो भी नहीं जा सकता .सिहत ठीक हो तो ही सब कुछ संभव है .

      • मनमोहन कुमार आर्य

        जी धन्यवाद् एवं नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी।

      • मनमोहन कुमार आर्य

        जी धन्यवाद् एवं नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी।

  • राजकुमार कांदु

    आदरणीय भाईजी ! आपकी लेखनी का जवाब नहीं । ऐसा सिलसिलेवार वर्णन पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम कोई चलचित्र देख रहे हों । बहुत बढ़िया लगा वहाँ के गाँव का विकास देखकर । हमारे यहाँ तो शहरों में भी सफाई और सडकों के हाल देखकर रोना आता है ।
    एक और बढ़िया कड़ी के लिए धन्यवाद ।

  • राजकुमार कांदु

    आदरणीय भाईजी ! आपकी लेखनी का जवाब नहीं । ऐसा सिलसिलेवार वर्णन पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम कोई चलचित्र देख रहे हों । बहुत बढ़िया लगा वहाँ के गाँव का विकास देखकर । हमारे यहाँ तो शहरों में भी सफाई और सडकों के हाल देखकर रोना आता है ।
    एक और बढ़िया कड़ी के लिए धन्यवाद ।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      राजकुमार भाई ,यह कड़ी भी आप को पसंद आई, मुझे बहुत ख़ुशी हुई . हूँ तो मैं भारती ही और शायद इसी लिए मुझे सफाई के बारे में लिखने की जरुरत महसूस हो रही है क्योंकि बहुत बातें ऐसी हैं, जिन को हम भारती समझना चाहते हुए भी समझ नहीं रहे .मोदी जी का सवश्ताभियान्न इसी लिए है किः उन्होंने बिदेशों में सब कुछ देखा है .जब मैं यहाँ आया था तो पहली दफा अपने गाँव में जा कर मैंने अपने घर के सामने दूर दूर तक सफाई कर दी थी, मेरा विचार था किः इस जगह फूलों के पौदे लगा भी लगा दूं लेकिन दो दिन बाद ही जब सुबह मैं उठा तो देखा किः किसी ने अपने घर का कूड़ा करकट वहां फैंक दिया था .देख कर मुझे गुस्सा भी आया और इन लोगों की समझ पे तरस भी .मेरे डैडी जो सारी उमट बाहर रहे थे, बोले ,गुरमेल ! इंगलैंड की कल्चर इन लोगों को रास नहीं, ऐसी बातें दिल से निकाल दे वर्ना यह लोग तुज पर हंसेंगे और कहेंगे,” कल यहाँ रहता था और आज इस को अक्ल आ गई “

  • लीला तिवानी

    प्रिय गुरमैल भाई जी, क्या ग़ज़ब की याददाश्त है आपकी! हर चीज़ का वर्णन आप ऐसे कर रहे हैं, जैसे अभी ही देख आए हों. रोचकता की निर्वाह भी भरपूर हो रहा है. एक और रोचक व सार्थक कड़ी के लिए आभार.

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      उत्साहवर्धक कॉमेंट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद लीला बहन .

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