गीतिका/ग़ज़ल

जाने किधर गए

चुपके से आके वो कहीं मुझमें ठहर गए
ना वो किसी अजीज के न अपने ही घर गए

ठहरे है ऐसे मोड़ पे जहाँ मंजिल के न निशां
मिल जाते काफिले मुसाफिर सारे गुज़र गए

अब ढूढते है शाम-ओ-शहर जलते हुए दिए
जल कर के खाक बन के उड़े जाने किधर गए

संभला नहीं उनसे जो दिल हमको दे दिया
मेरा क्या रख सकेंगे वो जो खुद ही बिखर गए

होते नहीं है इश्क में सज़दे तमाम के
पत्थर की बुत को तोड़ कर मंदिर में रख गए

खुशबू थी उनके इश्क में जो मै महक गई
खिल जाते है चमन “निराली” कहकर जिधर गए

— नीरू श्रीवास्तव निराली

 

नीरू श्रीवास्तव

शिक्षा-एम.ए.हिन्दी साहित्य,माॅस कम्यूनिकेशन डिप्लोमा साहित्यिक परिचय-स्वतन्त्र टिप्पणीकार,राज एक्सप्रेस समाचार पत्र भोपाल में प्रकाशित सम्पादकीय पृष्ट में प्रकाशित लेख,अग्रज्ञान समाचार पत्र,ज्ञान सबेरा समाचार पत्र शाॅहजहाॅपुर,इडियाॅ फास्ट न्यूज,हिनदुस्तान दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित कविताये एवं लेख। 9ए/8 विजय नगर कानपुर - 208005