गीत/नवगीत

स्वप्न…अंतर्मन की एक ग़ज़ल!!

मन के उद्वेलित सरवर में
स्वप्न भाव के नीलकमल हैं
नैनों के पृष्ठों पर अंकित
अन्तर्मन की एक ग़ज़ल हैं।

स्वप्न निराशा के आॅगन में
आशाओं की परिभाषा हैं
स्वप्नों के सागर में हरदम
रह कर भी ये मन प्यासा है।
रंग-बिरंगे स्वप्न नहीं तो
सारा जीवन वस्त्र धवल है
मन के उद्वेलित…..

स्वप्न अगर न होते मन में
तो जल-नभ में यान न होते
स्वप्न अगर ना पलते मन में
तो दर्शन और ज्ञान न होते
स्वप्नों ने ही इस धरती को
दिया प्यार का ताजमहल है
मन के उद्वेलित…..

क्या देखें वे स्वप्न नैन जो
अपनी राह ही ढूँढ़ ना पाएँ
क्या देखें वे स्वप्न नैन जो
परवशता का जीवन पाएँ
स्वप्न शांति के कोलाहल में
गीत क्रांति का एक नवल है
मन के उद्वेलित….

शरद सुनेरी